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720119 - Lecture Hindi - Jaipur

His Divine Grace
A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada



720119LE-JAIPUR - January 19, 1972 - 28:38 Minutes



Devotee: January 19th, Jaipur.

Prabhupāda:


HINDI TRANSLATION

भक्त: 19 जनवरी, जयपुर।

प्रभुपाद:

स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे
अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति

सुता गोस्वामी जी, बड़े-बड़े ऋषि और ब्राह्मण का सम्मलेन में ये बता रहे हैं जो वामधर्म पर धर्म है, पर और अपर, ये जो भौतिक जगत, इसको अपरा प्रकृति भगवान ने बताया है। पारा प्रकृति और अपरा प्रकृति। आज ही सवेरे भगवद-गीता की आलोचना हो रही थी;

भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा

फिर भगवान बताते हैं "अपरायम" ये जो प्रकृति है भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार, ये निकृष्ट प्रकृति है। जैसा बाजार में आप कोई चीज़ खरीदने को जाते हैं उसमे उत्कृष्ट और निकृष्ट विचार करते हैं कौन चीज़ अच्छी है, कौन चीज़ कमी है। तो भगवान खुद बताते हैं ये जो भौतिक जगत जो की भूमि याने मट्टी जल आकाश अग्नि "तेजो वाणी विनिर्मयम" भागवत में कहते हैं ये जो भौतिक जगत है "तेजो वाणी विनिर्मयम" मुट्ठी जल और अग्नि इसका मिक्सचर एक निकृष्ट वस्तु है और भगवान कहते हैं अपरायम ये निकृष्ट है। ये जो प्रकृति है ये निकृष्ट है। "अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्" इसका अलावा और एक प्रकृति है वो परा प्रकृति है। तो इधर सुता गोस्वामी बताते हैं "स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे" जैसा अपरा प्रकृति और परा प्रकृति है तो वो परा प्रकृति कौन है। तो भगवान कहते हैं "जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्" जो जीव है वो परा प्रकृति है जो की ये दुनिया को धारण करता है। जैसे मैं ये शरीर को धारण करता हूँ शरीर है अपरा प्रकृति और मैं जो आत्मा वस्तु है परा प्रकृति। तो आत्मा जीव ये प्रकृति है, ये पुरुष नहीं है। जो लोग भूल से अपने को पुरुर्ष समझता है, भोक्ता समझता है की हम नारायण हैं, हम भगवान हैं, नहीं, ये ब्रम है। इसका नाम है माया क्यूंकि प्रकृति कभी पुरुष नहीं हो सकता है। जैसा एक औरत को उसको अगर पुरुष का कपड़ा पहना दिया जाए, ये पुरुष हो गया। वो पुरुष का काम नहीं कर सकता है। इसी प्रकार जो प्रकृति है चाहे परा प्रकृति हो चाहे अपरा प्रकृति हो, वो भगवान कभी हो नहीं सकता है। भगवान पुरुष "गोविन्दम आदि पुरुषं तम अहम् भजामि" अभी जो हम लोग गीत गया ब्रह्म संहिता से, और भगवद-गीता में जब अर्जुन भगवद-गीता समझ गया उस समय भगवान को कहते हैं "पुरुषं आद्यं"

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्

तो पुरुष एकमात्र भगवान। पुरुष का अर्थ होता है भोक्ता, जो भोग करने वाला हो। औअर प्रकृति का अर्थ होता है भोग्या जिसको भोग किया जाता है। उसका नाम है प्रकृति। इसलिए भक्ति जो है ये पर धर्म, ये प्राकृत धर्म नहीं है। जो कहते हैं की ज्ञान बहुत कठिन है और भक्ति सरल है, वास्तविक बात ये है की भक्ति बड़ा कठिन है। ज्ञान जैसे भगवद-गीता से भगवान बता रहे हैं "ज्ञानं स विज्ञानं" ज्ञान बिना भक्ति नहीं हो सकती है। वास्तविक जो ज्ञानी है वो ही भक्ति को समझ सकता है। "तेषां ज्ञानी विशिष्यते"। भगवान खुद कहते हैं;

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत:

एक ज्ञानी का जो श्रेष्ट है 'यततामपि सिद्धानां' तो सिद्दी लाभ किये हुए है। ऐसे ज्ञानी है। ऐसे हज़ारों सिद्धि लाभ करने का भीतर कोई कृष्णा को समझ सकता है। इसलिए सुता गोस्वामी कहते हैं "स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे" जिस धर्म का याजन करने से अधोक्षजा, भगवान। अधोक्षज का अर्थ है ज्ञान से भी आगे; ज्ञान है अक्षज। ज्ञान अर्थार्थ हमारा जो इन्द्रिय है वो इन्द्रिय को परिचालना करके ज हमको ज्ञान मिलता है उसको साधारणतः ज्ञान कहते हैं मेन्टल स्पेक्युलेशन, इम्पेरिक नॉलेज, एक्सपेरिमेंटल नॉलेज, उसको ज्ञान कहा जाता है। "बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते" अनेक जन्म, एक जन्म नहीं जो की मेन्टल स्पेक्युलेशन करते हैं, मनो धर्म में चलते हैं 'हमारा मत ये है, हमारा मत ये है' अलग-अलग मत और कोई-कोई कहते हैं कितना मत है सब ठीक है। बाकि ये बात ठीक नहीं। जो वास्तविक ज्ञान है वो भगवद भक्ति। इसलिए भगवान कहते हैं "बहूनां जन्मनां अन्ते" अनेक जन्म-जन्मांतर ज्ञान की चर्चा करके जब वास्तविक ज्ञानी हो जाओ, ज्ञानवान, असल ज्ञान को लाभ कर लिया तब उसका फल क्या होता है वो मां प्रपद्यते भगवान कहते हैं। भगवान कृष्ण कहते हैं हमारा चरण में वो शरणागत हो जाता है। इसका नाम है ज्ञान। और जब तक भगवान का चरण में शरणागत नहीं होता है तब तक समझना वो अज्ञान। उसका अभी ज्ञान पूरा नहीं हुआ है। वो अपने को मुक्त मानते हैं बाकि मुक्त नहीं है। शास्त्र में बताते हैं "येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन" ऐसा मान लेते हैं की हम मुक्त हो गया, हम नारायण ह गया, हम भगवान हो गया। ये ऐसे तो सभी कोई मान सकते हैं। हम । बाकि वास्तविक उसको ज्ञान परिपक्व नहीं है। ज्ञान परिपक्व उससे ही है की जो भगवान का चरण में शरणागत हो गया। परिप्रश्न करना चाहिए "आदौ गुरूआश्रयम" गुरु आश्रय करके फिर नम्रता से, प्रणिपात करके उनकी सेवा करनी चाहिए। केवल परिप्रश्न करें, प्रणिपात करें और सेवा का कोई काम नहीं, नहीं। ये तो पारमार्थिक तत्त्व तभी लाभ हो सकता है जब "सेवोन्मुखी ही जिह्वादौ" केवल सेवा से। इसलिए भगवान कहते हैं "सर्व धर्मान परित्यज्य मां एकम शरणम व्रज" पहले सेवा करो, फिर भगवान को समझो। ऐसी बात नहीं है की कुछ हम किताब पढ़ लिया, वेदांत पढ़ लिया भगवान को समझ लिया। नहीं, इसलिए भगवान कहते हैं "यतताम अपि सिद्धानां कश्चिन मां वेति तत्त्वतः"

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्न‍ेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः

तात्त्विक समझने के लिए जो ज्ञानी, जो विद्वान जो भगवान को तात्त्विक जानते हैं उसका पास जा करके, उनका शिष्यत्व ग्रहण करके भगवान को समझने को मौका मिलेगा। वो दरवाज़ा खोल दे सकता है। "वेदेषु दुर्लभं अदृलभं आत्म-भक्तौ" ये सिद्धांत है। वेद-वेदांत चिरकाल पढोगे तो भी भगवान को नहीं समझ पाओगे। यदि भक्त का पास जाके उनका चरण में सर झुकादो तो वो तुमको भगवान को ऐसा हाथ में दे देगा की लो, वो दे सकता है। ये भगवान की विशेष कृपा है भक्त का भी। ये वेदांत कहते हैं यद् उपाश्रय श्रेय। यदि भगवान का भक्त का आश्रय ग्रहण करे, :किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कशा

आभीरशुम्भा यवना: खसादय:
येऽन्ये च पापा

और जितने भी पापी हैं यदि भागवत भकत का चरण का आश्रय ग्रहण करे तो शुद्ध्यन्ति, वो शुद्ध हो जायेगा। साधारण वो आदमी कहेंगे की देखो जी ये तो अमेरिकन है और म्लेच्छ है, यवन है इसको संन्यास नहीं दिया जाय। क्यों नहीं संन्यास दिया जाए। क्यूंकि वो शुद्ध करने का जो विधि है, वो शुद्ध करके सभी को दे सकता है। सब कोई। "किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कशा: आभीरशुम्भा यवना: खसादय:" भगवान के लिए सब का रास्ता खुला है। भगवान खुद कहते हैं "मां ही पार्थ व्यपाश्रित्य ये पि स्युः पाप योनयः"। कोई-न-कोई पापी इस ज़मीन पर जन्म लेता है लेकिन यदि भगवान का आश्रय ग्रहण करता है "ते पि यान्ति पराम गतिम्" सब तरह का गति का लाभ करेगा। ये सब शास्त्र सिद्धांत है। हमलोग का ये ही आईडिया था की अगर भगवान को मिल सकता है तो ये भारतीय को मिल सकता है, और किसी को नहीं मिल सकता है। भगवान कहते हैं सबको मिल सकता है, सब के लिए हमारा रास्ता खुला है। और चैतन्य महाप्रभु भी ये कहते हैं;

पृथ्विते आछे यत नगरादि-ग्रामा
सर्वत्र प्रचार हैबे मोरा नाम

सारा पृथ्वी जितना गांव है, जितना घर, सब जगह में ये हरिनाम कीर्तन, चैतन्य प्रभु का नाम प्रचार होये, ये हो रहा है। तो तात्त्विक समझना चाहिए। अपना वो सीमित बुद्धि से कर घर में बैठ करके काम नहीं हो सकता। "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये यततामपि सिद्धानां" अब जाके भागवत ज्ञान लाभ करने के लिए क्यूंकि हमारा जो ज्ञान है वो लकड़ी काट पत्थर का ज्ञान है हम तो लकड़ी को देख सकता है, पत्थर को देख सकता है, मट्टी को देख सकता है क्यूंकि हमारा आँख का अभी ये इतना शक्ति नहीं है की भगवान को देख सकता है। इसलिए भगवान हमको कृपा करने के लिए वो जो हम पत्थर देख सकते हैं इसलिए वो पत्थर का मूर्ति से भगवान हमारे सामने खड़े हुए हैं। ये तो भगवान की कृपा है क्यूंकि मैं तो पत्थर और लकड़ी का बिना देख ही नहीं सकता। तो भगवान अच्छा से मैं पत्थर का मूर्ति से ही तुमको कृपा कर दूंगा। ये भगवान की विशेष कृपा है और ये पत्थर नहीं है। भगवान को सभी चीज़ है, उसको भगवान समझा रहे हैं;

भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा

भगवान कहते हैं की हमारी सब प्रकृति है भिन्न। तो भुमिर,आपो, अनलो, वायु, ये भगवान से फरक कहाँ है। किधर से फरक है। सब "शक्ति शक्तिमतो अभेदा" शक्ति और शक्तिमान ये अभेद है जैसे सूर्य शक्तिमान है और उनका किरण जो है शक्ति है की आप सूर्य का किरण और सूर्य को अलग कर सकते हैं? नहीं, संभव ही नहीं। इसी प्रकार ये भगवान जो कहते हैं "भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च" ये ही ले करके हमारा शरीर है सारा भौतिक दुनिया, भुमिर, भूमि का अर्थ होता है ज़मीन, आपो का अर्थ होता है जल, अनलः का अर्थ होता है अग्नि, वायु हवा और ख़म आकाश और मन और बुद्धि, ये सब चीज़ भगवान का ही शक्ति का परिचय है। और ये ही सब चीज़ ले करके हमारा शरीर बना है। तो हमारा शरीर जो है ये भगवान का ही है, ये तो सब कोई समझ सकता है। और जब भगवान का शरीर है, ये भगवान की चीज़ है, तो भगवान की सेवा में लगना चाहिए। जैसा हमारा मकान है तो हम रहेंगे उसको मैं करेंगे, उसमे दूसरा आदमी क्यों दखल देंगे। इसी प्रकार यदि सब चीज़ भगवान का शक्ति का ही परिचय है तो तुम्हारा चीज़ कहाँ से हुआ? तुम्हारा चीज़ कहाँ है? इसी का नाम है माया। "अहम् ममेति" ये हमारा है और ये मैं हूँ। "जनस्य मोहोयं" ये ही मोह है। चीज़ तो सब भगवान का है और मैं सोचता हूँ की ये हमारा है। उधारण स्वरुप समझ लीजिये की जैसा एक बढ़ई है, आप उनको लकड़ी दिया, उनको पैसा भी दिया है, उनको यंत्र भी दिया है, और समझ लीजिये चीज़ बना दिया, एक चौकी बना दिया, एक अलमीरा बना दिया। अब वो कहता है की हज़ूर ये तो मैं बनाया हूँ, ये हमारा चीज़ है। ये हो सकता है क्या। जो तुमको चीज़ दिया है, जो तुमको पैसा दिया है, वो उनका है। ये जो हमलोग मकान बनाते हैं मट्टी पत्थर और लकड़ी तो ये मट्टी पत्थर और लकड़ी किसका है, ये भगवान का है। तो थोड़ा तकलीफ करके, परिश्रम करके एक मकान बना लिया, तो तुम्हारा माकन कैसा हो गया? देखिये थोड़ा समझ करके। भगवान कहते हैं की सब हमारा चीज़ है, तो तुम्हारा कैसा हो गया? ये जो बुद्धि है ये तात्त्विक ज्ञान है। इस प्रकार समझ करके जो चलते हैं वो तात्त्विक ज्ञान का विषय से लाभ कर सकता है।

ईशावास्यम् इदं सर्वं
यत् किंच जगत्यां जगत्
तेना त्यक्तेना भुञ्जीथा
मा गर्धाः कस्य स्विद् धनम्

ये उपनिषद् का उपदेश है और भगवान खुद भी कहते हैं सब चीज़ हमारा है तो ये सब चीज़ भगवान का है फिर मैं उसमे क्यों दखल देता हूँ की ये हमारा चीज़ है। ये ही अशांति का कारण है। ये बुद्धि जब हमको खुल जायेगी जी हमारा चीज़ कोई है नहीं। कोई भी चीज़ हमारा नहीं है, सब भगवान का चीज़ है, ये हमारा शरीर भी भगवान का है और मैं जो है जीवात्मा, मैं भी भगवान का अंश है। तो सब जो भगवान का हो गया, तो हमारा काम क्या रह गया? हमारा उंगली, ये हमारा उंगली क्या काम करेगा, हमारा सेवा करेगा। तो इसी प्रकार सब भगवान का ही हुआ तो सब भगवान का सेवा में लगाना चाहिए। इसका नाम है तात्त्विक दर्शन "वेत्ति माम् तत्त्वतः" इस प्रकार विचार करके सब चीज़ आप ग्रहण करेंगे तो प्रति पद-पद भगवान का दर्शन होगा। भगवान दर्शन करना कोई मुश्किल नहीं है। इस प्रकार ज्ञान होना चाहिए जो वास्तविक मैं कौन है? भगवान क्या चीज़ है? हमारा क्या संपर्क है? ये यदि हमलोग समझ जाएँ ठीक-ठीक से तो ये भगवान का तात्त्विक दर्शन हो जायेगा। थैंक यू वैरी मच। हरे कृष्णा। जय

भक्त: 19 जनवरी, जयपुर।

प्रभुपाद:

स वै पुंसां परो धर्मो
यतो भक्तिरधोक्षजे
अहैतुक्यप्रतिहता '
ययात्मा सुप्रसीदति

सुता गोस्वामी बड़े-बड़े ऋषि औअर ब्राह्मण का सम्मलेन में ये बता रहे हैं जो वामधर्म पर धर्म है, पर और अपर, ये जो भौतिक जगत, इसको अपरा प्रकृति भगवान ने बताया है। परा प्रकृति और अपरा प्रकृति। आज ही सवेरे भगवद-गीता की आलोचना हो रही थी;

भूमिरापोऽनलो वायु:खं मनो बुद्धिरेव च
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा

फिर भगवान बताते हैं "अपरायम" ये जो प्रकृति है भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार, ये निकृष्ट प्रकृति है। जैसा बाजार में आप कोई चीज़ खरीदने को जाते हैं उसमे उत्कृष्ट और निकृष्ट विचार करते हैं कौन चीज़ अच्छी है, कौन चीज़ कमी है। तो भगवान खुद बताते हैं ये जो भौतिक जगत जो की भूमि याने मट्टी, जल, आकाश, अग्नि, "तेजो वारि मृद विनिर्मयम" भागवत में कहते हैं ये जो भौतिक जगत है "तेजो वारि मृद विनिर्मयम" मुट्ठी जल और अग्नि इसका मिक्सचर एक निकृष्ट वस्तु है और भगवान कहते हैं अपरायम, ये निकृष्ट है। ये जो प्रकृति है ये निकृष्ट है। "इतस तू विद्धि में प्रकृतिम पराम्" इसका अलावा और एक प्रकृति है वो परा प्रकृति है। तो इधर सुता गोस्वामी बताते हैं "स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिर धोक्षजे" जैसा अपरा प्रकृति और परा प्रकृति है तो वो परा प्रकृति कौन है। तो भगवान कहते हैं "जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्" जो जीव है वो परा प्रकृति है जो की ये दुनिया को धारण करता है। जैसे मैं ये शरीर को धारण करता हूँ शरीर है अपरा प्रकृति और मैं जो आत्मा वस्तु है परा प्रकृति। तो आत्मा जीव ये प्रकृति है, ये पुरुष नहीं है। जो लोग भूल से अपने को पुरुर्ष समझता है, भोक्ता समझता है की हम नारायण हैं, हम भगवान हैं, नहीं, ये ब्रम है। इसका नाम है माया क्यूंकि प्रकृति कभी पुरुष नहीं हो सकता है। जैसा एक औरत को उसको अगर पुरुष का कपड़ा पहना दिया जाए, ये पुरुष हो गया। वो पुरुष का काम नहीं करते हैं। इसी प्रकार जो प्रकृति है चाहे परा प्रकृति हो चाहे अपरा प्रकृति हो, वो भगवान कभी हो नहीं सकता है। भगवान पुरुष "गोविन्दम आदि पुरुषं तम अहम् भजामि" अभी जो हम लोग गीत गाया ब्रह्म संहिता से, और भगवद-गीता में जब अर्जुन भगवद-गीता समझ गया उस समय भगवान को कहते हैं "पुरुषं आद्यं"

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्

तो पुरुष एकमात्र भगवान। पुरुष का अर्थ होता है भोक्ता, जो भोग करने वाला हो। और प्रकृति का अर्थ होता है भोग्या जिसको भोग किया जाता है। उसका नाम है प्रकृति। इसलिए भक्ति जो है ये पर धर्म, ये प्राकृत धर्म नहीं है। जो कहते हैं की ज्ञान बहुत कठिन है और भक्ति सरल है, वास्तविक बात ये है की भक्ति बड़ा कठिन है। ज्ञान जैसे भगवद-गीता से भगवान बता रहे हैं "ज्ञानं स विज्ञानं" ज्ञान बिना भक्ति नहीं हो सकती है। वास्तविक जो ज्ञानी है वो ही भक्ति को समझ सकता है। "तेषां ज्ञानी विशिष्यते"। भगवान खुद कहते हैं;

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत:

एक ज्ञानी जो श्रेष्ट है 'यततामपि सिद्धानां' तो सिद्दी लाभ किये हुए है। ऐसे ज्ञानी है। ऐसे हज़ारों सिद्धि लाभ करने का भीतर कोई कृष्णा को समझ सकता है। इसलिए सुता गोस्वामी कहते हैं "स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे" जिस धर्म का याजन करने से अधोक्षजा, जो भगवान। अधोक्षज का अर्थ है ज्ञान से भी आगे; ज्ञान है अक्षज। ज्ञान अर्थार्थ हमारा जो इन्द्रिय है वो इन्द्रिय को परिचालना करके जो हमको ज्ञान मिलता है उसको साधारणतः ज्ञान कहते हैं, मेन्टल स्पेक्युलेशन, इम्पेरिक नॉलेज, एक्सपेरिमेंटल नॉलेज, उसको ज्ञान कहा जाता है। "बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते" अनेक जन्म, एक जन्म नहीं जो की मेन्टल स्पेक्युलेशन करते हैं, मनो धर्म में चलते हैं 'हमारा मत ये है, हमारा मत ये है' अलग-अलग मत और कोई-कोई कहते हैं कितना मत है सब ठीक है। बाकि ये बात ठीक नहीं। जो वास्तविक ज्ञान है वो भगवद भक्ति। इसलिए भगवान कहते हैं "बहूनां जन्मनां अन्ते" अनेक जन्म-जन्मांतर ज्ञान की चर्चा करके जब वास्तविक ज्ञानी हो जाओ, ज्ञानवान, असल ज्ञान को लाभ कर लिया तब उसका फल क्या होता है वो 'मां प्रपद्यते' भगवान कहते हैं। भगवान कृष्ण कहते हैं हमारा चरण में वो शरणागत हो जाता है। इसका नाम है ज्ञान। और जब तक भगवान का चरण में शरणागत नहीं होता है तब तक समझना वो अज्ञान। उसका अभी ज्ञान पूरा नहीं हुआ है। वो अपने को मुक्त मानते हैं, बाकि मुक्त नहीं है। शास्त्र में बताते हैं "येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन" ऐसा मान लेते हैं की हम मुक्त हो गया, हम नारायण हो गया, हम भगवान हो गया। ये ऐसे तो सभी कोई मान सकते हैं। हम । बाकि वास्तविक उसको ज्ञान परिपक्व नहीं है। ज्ञान परिपक्व उसका ही है की जो भगवान का चरण में शरणागत हो गया।