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720120 - Lecture Hindi - Jaipur

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His Divine Grace
A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada



720120LE-JAIPUR - January 20, 1972 - 57:26 Minutes



Prabhupāda:

HINDI TRANSLATION

प्रभुपाद:

भूमिरापोऽनलो वायु:
खं मनो बुद्धिरेव च
अहङ्कार इतीयं मे
भिन्ना प्रकृतिरष्टधा
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्

तो भगवान के दुइ प्रकार की प्रकृति अपरा और परा। जब अपरा प्रकृति में मैं आकृष्ट रहता हूँ, उस समय जो धर्म याजन करता हूँ वो अपरा प्रकृति। जैसे हमलोग समझते हैं की हमारा धर्म है हिन्दू धर्म। कोई समझता है की हमारा धर्म मुस्लमान धर्म, क्रिश्चियन धर्म। कोई समझता है की हमारा धर्म देश की सेवा, देश धर्म। कोई समझता है समाज की सेवा ये हमारा धर्म है। तो ये सब जितने धर्म हैं तो ये जितने भी धर्म हैं क्यूंकि ये शरीर से सम्बंधित हैं, ये सब अपरा धर्म, निकृष्ट धर्म। तो निकृष्ट धर्म में रहने से ठीक धर्म याजन होता नहीं। इसको शास्त्र में कहते हैं कैतव धर्म। कैतव का अर्थ होता है छलना, चीटिंग। भागवत में पहले ही कह दिया की "धर्म प्रोजिता अत्र कैतव" ये जितना चीटिंग धर्म है, छलना पूर्वक धर्म है, याने धर्म के नाम से चलता है, असल में धर्म नहीं है। पहले थोड़ा समझिये की धर्म किसको कहा जाता है। धर्म शास्त्र में बताते हैं "धर्मं तू साक्षात भगवत प्रणीतं"। धर्म जो भगवान की वाणी है, भगवान का जो हुक्म है, वो है धर्म। क्यों, जीव है भगवान का अंश मात्र। "ममैवांशो जीव भुता" जैसे कल हमने आप के सामने प्रस्तुत किया की ये जैसे हमारा उंगली है ये शरीर का अंश है औअर मैं चाहता हूँ की उंगली थोड़ा हमको सर में खुजलाओ, इसी वक्त शुरू करो, पैर में थोड़ा। तो जैसे ये अंश का उचित है वो कहा हुक्म मानना। और भी बहुत सा उदहारण हो सकता है। जैसा गवर्नमेंट कुछ हुक्म दिया आपका विधान सभा में सभापति जो हुक्म देगा उसको मानने पड़ेगा। इसी प्रकार कोई कानून है। तो धर्म का अर्थ होता है जिसको आप छोड़ नहीं सकता है। आप ऐसा नहीं कह सकते हैं की हम गवर्नमेंट का कानून नहीं मानते। नहीं, फिर आप तकलीफ में पड़ सकते हैं। आप दुखी होंगे, गवर्नमेंट शाशन करेगा। तो धर्म क्या चीज़ है? धर्म ये चीज़ है जो भगवान बना दिया, उसका नाम है धर्म। जैसा भगवान बना देते हैं, जैसा इमली है वो खट्टई और स्वीट है वो मिठाई। ये भगवान बना दिया। पानी जो है वो तरल है और पत्थर जो है वो कठिन है। ये कौन बनाय।? भगवान बना दिया। तो पत्थर है और कठिनता है नहीं ऐसा हो नहीं सकता। जहाँ पत्थर रहेगा वहां कठिनता रहेगा। जहाँ पानी रहेगी उधर तरलता रहेगी। जहाँ अग्नि है उधर ताप है, प्रकाश है। तो धर्म इसी प्रकार है। इसको समझना चाहिए। धर्म ये नहीं है मन माफिक कोई धर्म हम बना लिया। धर्म का अर्थ ये है "त्रिधातु "जो चीज़ साथ-साथ में रहता है। जैसा आपका हाथ में थोड़ा सा चीनी कोई दिया, आप जानते हैं की इसका धर्म है मिठाई। अगर वो चीनी को आप आस्वादन करके देखें ये क्या, ये तो मीठा नहीं है, ये चीनी है नहीं क्यूंकि वो धर्म है नहीं। इसी प्रकार समझना चाहिए की जीवात्मा का धर्म क्या है। सब चीज़ का अलग-अलग धर्म है तो जीवात्मा जो है भगवान का अंश है उसको धर्म क्या है? अंश का धर्म है पूर्ण की सेवा। ये ही धर्म है। तो भगवत सेवा ये ही असल धर्म है। इसलिए शास्त्र में कहते हैं "स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे" धर्म तो ऐसे बहुत से हैं नाना प्रकार, बाकि शास्त्र में कह दिया ये सब चीटिंग धर्म है। ये धर्म नहीं है। इसीलिए भगवान कहते हैं "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" क्यूंकि वो चीटिंग धर्म में सब पड़े हुए हैं। इसीलिए भगवान खुद आकर उनको सीखा रहे हैं की ये धर्म है। भगवान क्यों आते हैं "धर्म संस्थाप नार्थाय" धर्म को संस्थापन करने के लिए;

यदा यदा हि धर्मस्य
ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानमधर्मस्य
तदात्मानं सृजाम्यहम्
परित्राणाय साधूनां
विनाशाय च दुष्कृताम्
धर्मसंस्थापनार्थाय
सम्भवामि युगे युगे

तो भगवान आते हैं धर्म संस्थापन करने के लिए। ये भगवना का अवतार का अर्थ होता है की वो धर्म संस्थापन करने। और फिर जाके भगवान कहते हैं की "सर्वधर्मान्परित्यज्य"। देखिये भगवान धर्म संस्थापन करने के लिए आये हैं, तो ये सब धर्म छोड़ने को क्यों कहते हैं? ये विचार करने के लिए। छोड़ने के लिए इसिलए कहते हैं की वो सब धर्म नहीं है। वो सब चीटिंग है। धर्म कैतव, कैतव का अर्थ होता है छलना, चीटिंग। जिस धर्म में भगवद भक्ति नहीं सिखाया जाता, भगवान का चरण में शरणागति सिखाया नहीं जाता, वो चीटिंग धर्म है। ये स्पष्ट बताते हैं "स वई पुंसां परो धर्मो" वो ही श्रेष्ट धर्म है, उत्कृष्ट धर्म है। जिस धर्म द्वारा भगवद भक्ति सिखाया जाये। "यतो भक्तिर अधोक्षजे" भक्ति का अर्थ होता है भगवान और भक्त और बीच में कार्यक्रम, उसका नाम है भक्ति। सब एकाकार नहीं। भगवान भी मौजूद हैं, भक्त भी मौजूद है और भक्त से भगवान से जो कार्यक्रम है उसकी नाम है भक्ति। और वो भक्ति कैसी, अहैतुकी की भगवान हमको कुछ देंगे, भगवान से कुछ अदा करना है, इसलिए मैं भक्ति कर रहा हूँ। नहीं, वो शुद्ध भक्ति नहीं है। भक्ति अहैतुकी, कोई हेतु नहीं। भगवना हमर प्रभु है, हमारा काम है भगवान की सेवा। ये शुद्ध भक्ति है। अहैतुकी, जैसा ये उंगली हमारा अंश है, हम दस दिन उसको खाने को नहीं देंगे बाकि सेवा करो, हम ये नहीं कहेंगे की हमको खाने को नहीं दिया हम सेवा नहीं करेंगे। नहीं। भगवान चाहे जिस अवस्था में हमको रखें हमारी काम है सेवा। जैसा महाराज कुलशेखर मुकुंद माला स्तोत्र में कहते हैं "यद्-यद् भवं भवित" जो होने वाला है हमारा कर्म फल का अनुसार वो होने दीजिये। वो हम परवाह नहीं करेंगे बाकि हमारा मन सब समय आपका चरण में अर्पित रहेगा। ये ही मैं चाहता हूँ। चैतन्य महाप्रभु भी सीखा रहे हैं "न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये"। आरती में गीत गाते हैं की "धन घर आवे जय जगदीश" जगदीश का भजन करते हैं की हमारा धन घर में आये। ये शुद्ध भक्ति नहीं है, ये अहैतुकी, मैं भगवान का आरती कर रहा हूँ, भजन कर रहा हूँ, कीर्तन कर रहा हूँ इसलिए कृष्णा हमको धन घर आवे। ये शुद्ध भक्ति नहीं है। ये विद्या भक्क्ति है, ज्ञान कर्म का आश्रय से। कर्मी लोग जैसा कुछ प्रॉफिट मांगता है इतना लोग परिश्रम करते हैं कर्मी लोग उसका अगर कुछ प्रॉफिट न ह।, कुछ लाभ न हो तो वो कहते हैं बेकार का काम है। परन्तु भक्ति जो है इस प्रकार भौतिक लाभ, प्रॉफिट करने के लिए नहीं। की हमारा पास अभी हज़ार रूपया है, भगवान की भक्ति करके मैं दस हज़ार कर लूँगा, लाख रूपया कर लूँगा। इसको भक्ति नहीं कही जाती है परन्तु भजन कहा जाता है। "चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन" सुकृति ये जो भजन है ये सुकृतिवान करते हैं, ये पुण्यवान करते हैं। भगवान का पास मंदिर में जाते हैं, भगवान का पास कुछ मांगने के लिए उसको शास्त्र में पुण्यवान कहा है। सुकृति, क्यूंकि जो पापी है वो भगवान का पास जाते ही नहीं। इसलिए अगर भगवान का पास अगर कोई कामना लेकर जाये तो वो भी पुण्यवान। "श‍ृण्वतां स्वकथा: कृष्ण: पुण्यश्रवणकीर्तन:" कोई भी भाव से अगर भगवान का नाम, गुण, लीला, परिकर, वैशिष्ट, इसका श्रवण किया जाये तो वो पुण्य होता है। बाकि भक्त के लिए पाप-पुण्य नहीं। पाप भी बंधन का कारण है, पुण्य भी बंधन का कारण है। इसलिए भगवद भक्त जो है पाप-पुण्य का ऊपर है। वो पाप-पुण्य से उसको मतलब नहीं है। उसका मतलब है भगवान को संतुष्ट करना। उसे पाप होइ पुण्य होइ परवाह नहीं। इसलिए कहते हैं ये शुद्ध भक्ति का जो विचार है "अन्य अभिलषिता शून्यं" कोई अभिलाषा नहीं, बिलकुल शून्य। "अन्याभिलाषिता-शून्यं ज्ञान-कर्मादि-अनावृतम" और ज्ञानी लोग का विचार है "निर्भेदः ब्रह्मनुसन्धान" ये ब्रह्म से मिल जाना, एक हो जाना। ये ज्ञानी का विचार है। ज्ञान कर्मा, और कर्मी का विचार है हमको भौतिक सुख उसको मिल, हमको स्वर्ग लोक प्राप्त हो जाये, जान लोक, महर लोक, खूब अच्छी तरह से खाने को मिले, बाकि ये कर्मी का विचार है। बाकि भक्ति का जो विचार है वो "ज्ञान कर्मादि अनावृतं"। ज्ञान का, कर्म का जो फल है उससे अति। जैसा श्रीधर स्वामी बता रहे हैं की श्रीमद भागवत में "धर्म: प्रोज्झितकैतवोऽत्र" उधर श्रीधर स्वामी कहते हैं "अत्र श्रीमद भागवते मूर्खवाँछा अभिसंधि पर्यन्तं निरस्तः" जो मूर्ख कामना करते हैं वो भी निरस्त है, वो भी ठीक नहीं है। मुर्ख का ऊपर इसको कहा जाता है अहैतुकी, अधोक्षजे। "स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे अहैतुक्यप्रतिहता" इस प्रकार की जो भक्ति है वो कभी प्रतिहत नहीं हो सकता है। की साहेब हम तो गरीब हैं हम कैसे भक्ति याजन करें, अभी तो पेट के लिए धंधा कर रहा हूँ, नहीं। अप्रतिहता चाहे गरीब होये, चाहे आमिर होये, चाहे मुर्ख होये, जो कोई होये, चाहे नीच होये, चाहे पापी होये सब के लिए खुला है। "अहैतुकी अप्रतिहता"। कोई प्रतिहता नहीं, केवल चाहिए हमको निश्चित करना की आज से भगवान का चरण में अर्पित हो जाऊँगा। ये बात नहीं है की हम मुर्ख है, अभी हम वेदांत पढूंगा, ज्ञान लाभ करूंगा तब जाके भगवद भक्ति करूंगा। अभी हम गरीब हैं, अभी हमको दो-चार-दस लाख रुपए कमाने दो फिर भक्ति करूंगा। अभी हम बालक हैं, अभी हम भक्ति कैसे करूंगा। ये सब नहीं, बालक भी कर सकता है। देखिये एक बालिका चार वर्ष उम्र है देखिये नाच रही है, अप्रतिहता। ये बात नहीं है की ये बालिका है, अभी छोटी है, उसको अभी ज्ञान लाभ करने पड़ेगा और उसको और-और सब काम करने पड़ेगा तब भक्ति, नहीं। इमीडिएटली, क्यूंकि इस जगत में बालक और वृद्ध का क्या विचार है। सभी वृद्ध है, सभी बालक। कोई बालक है इसका कोई गॅरंटी है क्या की सौ वर्ष जियेगा, नहीं। जब जीवन है; प्रह्लाद महाराज कहते हैं "दुर्लभं मानुषं जन्म तदप्यध्रुवमर्थदम्"। ये जो मनुष्य जीवन है ये तो दुर्लभ है। बहुत मुश्किल से मिला है, चौरासी लाख योनि ब्रह्मण करते-करते-करते। ये अगर वृक्ष हो गया तो दस हज़ार वर्ष खड़ा होगा। अमेरिका में सान फ्रांसिस्को का एक बगीचा में देखा परिचय किया की ये सात हज़ार वर्ष का आयु अभी तप रहा है और अभी चाहे सात हज़ार वर्ष और जियेगा। तो इस प्रकार जीवन मिलता है। ऐसा लम्बा-चौड़ा जीवन मिलने से क्या लाभ है। बड़े-बड़े साइंटिस्ट लोग चाहते की मनुष्य को, समाज को ज़्यादा करके जिन्दा रहें। तो ज़िंदा रहने से क्या फायदा होगा, ऐसे तो पेड़ भी ज़िंदा रहता है। आइंदा चाहे दो ही वर्ष का हो, भगवद भक्ति लाभ करो तब जीवन सफल होगा। और नहीं तो पेड़ का जैसे दस हज़ार वर्ष खड़ा रहने से क्या लाभ है। शास्त्र में इसी प्रकार सब विचार किया है। "तरवो अपि मूल जीवन्ति", ये जो वृक्ष है, ये क्या जीता नहीं है। और अगर कोई कहे की हाँ जीता है बाकि ये जो मैथुन सुख इनको नहीं। तो शास्त्र जवाब देते हैं की क्या कुत्ता, सूअर का मैथुन सुख है नहीं। इसी प्रकार सब विचार किया है। तो मनुष्य जीवन का उचित है "स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे" भगवान का जन्म है अधोक्षजा ,ये ज्ञान का परिचय प्रत्यक्ष, अपरोक्ष, अप्रत्यक्ष अधोक्षजा अप्राकृति"। सब ज्ञान एक नहीं है। साधारण व्यक्ति को ज्ञान प्रत्यक्ष, सामने आँख में जो कुछ देखता है, उसको ही समझता है सत्य वस्तु, और सब नहीं चाहिए। वो प्रत्यक्ष ज्ञान। बाकि ये ज्ञान ठीक नहीं है। हमारा प्राकृत महा कोई नाम है हम आँख से कभी देखा नहीं, इसका मतलब क्या वो है नहीं ,इसी प्रकार भगवान को अगर हम देखता भी नहीं, इसका मतलब ये नहीं है की मैं कहता की भगवान नहीं है। ये तुम हमको भगवान को दिखाओ। तुम भगवान को कैसे देखोगे। पहले तो प्रैक्टिस करो की कैसे भगवान को देखने होता है।

प्रेमाञ्जन-च्छुरित-भक्ति-विलोचनेन
संतः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति

भगवद प्रेम लाभ करो। किस तरह से भगवद प्रेम लाभ करना होता है उसको सीखो, आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ो, भगवान को जरूर देखोगे। कैसे देखोगे "प्रेमाञ्जन-च्छुरित-भक्ति-विलोचनेन:संतः सदैव" चौबीस घंटा भगवान ही खाली देखो। खाली आँख को बनाओ। वो आँख बनाने का तरीका क्या है? "सर्वोपाधी विनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलं" ये जो हमारा आँख है, आँख से जो मैं देखता हूँ, ये क्या देख रहा हूँ, ये हमारा देश है, हमर फॅमिली है, हमारा शरीर है, हमारा बच्चा है, हमारा पुत्र है, हमारा धन है, ये ही सब देख रहा है। अब जब देखोगे की ये शरीर भी भगवान का है, ये धन भी भगवान का है, ये देश भी भगवान का है, जो कुछ देख रहा है। तो जो कुछ भगवान सीखा रहे हैं "रसो हम अप्सु कौन्तेय" ये जो पानी पीते हो, ये पानी का जो रस है वो मैं हूँ। इसी प्रकार देखने शुर करो। पानी तो सब पीते हैं। जब पानी पियो, आस्वादन करो उसी प्रकार भगवान को देखो की देखो जी ये जो आस्वादन है ये भगवान है। "प्रभास्मि शशि सूरयः" इस प्रकार शास्त्र में भगवान खुद निर्देश देते हैं इस प्रकार देखने को शुरू करो। "सर्वोपाधी विनिर्मुक्तं" अगर ये देखते हो पानी को की ये हमारा देश का पानी है और जो भगवद भक्त देखता है की ये जो पानी का रस है ये भगवान है, इतना ही फरक है। "प्रेमांजना चुरित भक्ति विलोचनेना" इसी प्रकार भगवद भक्ति, यानी भगवद प्रेम सब समय भगवान का स्मरण, श्रवण, कीर्तन "श्रवणम कीर्तनम विष्णु स्मरणम पाद सेवनं अर्चनं वन्दनं दास्यम सख्यं आत्मा निवेदनम" अनेक प्रकार का भगवान सुविधा दिए हैं। वो अनेक प्रकार सुविधा लेओ। चाहे एक लेओ। जैसा इधर है; इधर श्रवण भी होता है, कीर्तन भी होता है, भगवान का अर्चन भी होता है, दास्य भी होता है, सख्य भी होता है, और 'सर्वात्म स्नपनं" ये नवविधा भक्ति पूर्ण है। अगर ये पूर्णतः कोई नहीं कर सकता है तो भगवद भक्ति ऐसी अप्राकृत वस्तु है जो नवविधा का भीतर नौ करो, आठ करो, सात करो, छ करो, पांच करो, आगे ककुम-से-कम एक भी तो करो। जैसा ये श्रवण का सुविधा ये जो हमलोग सब जगह में केंद्र खोल रहा हूँ क्यों, की आदमी को श्रवण का सुयोग दिया जाये की कम-से-कम इधर आये और सुने। वो सुनते-सुनते ही हो जायेगा। जैसा परीक्षित महाराज "श्रवणे परीक्षित" अवध वैयासकी कीर्तन" तो परीक्षित महाराज जब उनको मरने का समय हुआ, सात दिन नोटिस मिला, देखो जी सात दिन में तुमको मरने का है। वो ब्राह्मण बालक उसको श्राप दे दिया की तुमको मरने पड़ेगा। बड़ा अन्याय किया। तो इसीसे कलियुग शुर हो गया। तो उनको सात दिन टाइम मिला। तो सात दिन क्या करनी चाहिए। तो सब बड़े-बड़े ऋषि, बड़े-बड़े देवता, सम्राट पहुँच गए तो उस समय सुखदेव गोस्वामी पहुँच गए क्यूंकि परीक्षित महाराज भक्त थे और सुखदेव गोस्वामी उस समय पहुँच गए की ये तो बड़ा भारी भक्त है जब करेंगे मैं उनको थोड़ा देख के आऊँगा। पिताजी व्यासदेव भी मौजूद थे। तो अनेक प्रकार "नासाव ऋषिर यस्य मतं न भिन्नम्" अनेक प्रकार। परीक्षित महाराज पुछा की अब अंतिम समय में हमको क्या करना चाहिए। तो कोई कहा योग करिये, कोई कहा ध्यान कीजिये, कोई कहा कर्म कीजिये, कर्म काण्ड का कीजिये बाकि सुखदेव गोस्वामी ने कहा की केवल भगवान का कीर्तन सुनिए। श्रीमद भागवत सुनिए। तो सब ऋषि लोग सहमत हो गया की ये जो सुखदेव गोसामी कह रहे हैं ये ही ठीक है। तो महाराज सुना और कुछ कार्यक्रम नहीं किया। केवल बैठ के भागवत सुना। इसीलिए "श्रवणे परीक्षित" परीक्षित महाराज केवल श्रवण करके मुक्त हो गए, भगवान का चरण उनको प्राप्त हो गया। और सुखदेव गोसामी केवल कीर्तन करे। कीर्तन, ये जो हम आपलोग को सुना रहा हूँ। ये भी कीर्तन है। कीर्तन का अर्थ नहीं है की ढोल और झांझ लेकर ही कीर्तन हो। "कीर्तन कीर्तयती" भगवान का जहाँ विचार होता है वो भी कीर्तन। तो "श्रवणम कीर्तनम विष्णु" और किसी का नहीं। की हमलोग मीटिंग में जाते हैं, कोई पोलिटिकल विषय के बारे में सुनते हैं, वो श्रवण नहीं। "श्रवणम कीर्तनम विष्णु" इसमें काम बने। और नहीं तो वो यूनाइटेड नेशंस में केवल श्रवण कीर्तन ही होता है अंड-षंड इधर-उधर बकता है बीस वर्ष से पीस स्थापन करने के लिए। वो श्रवण से कुछ काम नहीं होगा। वो चाहे हज़ारों वर्ष करते फिरे। ये श्रवण से काम होगा। "श्रवणम कीर्तनम विष्णु" ये शास्त्र का निर्देश है। इसका मीटिंग बनाइये, इसका असेंबली बनाइये। इसका (नॉट ऑडिबल)। ये जो अग्नि जल रहा है, ये । तो ये सब विचार है, शास्त्र के विचार है, बड़े-बड़े आचार्य का विचार है। इसको छोड़ न दीजिये। इसको ग्रहण किजीये। ये निर्गुण विचार है। साधारण व्यक्ति का चार दोष होता है ब्रह्म, प्रमाद, करनपाटा, विप्रलिप्सा, और जो मुक्क्त व्यक्ति है, इसीलिए पांच हज़ार वर्ष पहले ये भागवत को लिखा गया था और भगवद-गीता भगवान स्वयं बताये थे। वो पुरानी नहीं हुई है। वो आज तक नवीन है। आज तक उसमे बड़े-बड़े ऋषि लोग, आचार्य लोग उसमे लाभ उठाता है। क्यों? ये कोई मुर्ख बद्ध जीव का लिखा नहीं है। ये मुक्त जीव का लिखा है जिसका चार दोष नहीं है ब्रह्म, प्रमाद, करनपाटा, विप्रलिप्सा। इसलिए शास्त्र उसको माना जाता है। देखिये भगवद-गीता में, श्रीमद भागवतम में बुद्ध देव का विषय लिखा है "लिखितेषु भविष्यते"। पांच हज़्ज़ार वर्ष पहले श्रीमद भागवत जो रचना की गयी थी। और बुद्ध देव आज से ढाई हज़ार वर्ष पहले उनका जन्म हुआ। इसलिए भागवत में भगवान का ये अवतार वर्णन है। बुद्ध देव का भी नाम दिया है, परन्तु लिखता है भविष्यति, आगे जा करके होंगे। इसका नाम है शास्त्र। त्रिकालगण्य, तीन काल को जानते हैं भूत, भविष्य और वर्त्तमान। सब कुछ जानते हैं। समेहो भगवान खुद कह रहे हैं की मैं भूत, भविष्य, वर्त्तमान सब कुछ जानता हूँ। इसलिए उसी को ग्रहण करना चाहिए जो भूत, भविष्य, और वर्त्तमान सब कुछ जानते हो। जैसे भगवान भगवद-गीता में कहते हैं की "देखो अर्जुन तुम क्यों इतना शोक करते हो। तुम, हम, और जितने सिपाही और राजा लोग इधर हैं, ये पहले भी थे, अभी भी हैं और आगे भी रहेंगे। इसका नाम है भूत, भविष्य, और वर्त्तमान श्रवण। जो इस प्रकार भूत, भविष्य, वर्तमान समझते हैं, जिसका आँख तीन इंची नहीं है, अभी बत्ती बुझ जाये तो आँख सब ख़तम हो जाये, वो नहीं। वो बत्त्ती जले या न जले, देख सकता है भूत भविष्य, उनसे सुनना चाहिए। उनका बात लेना चाहिए और नहीं तो "अँधा यथान्दैर उपनीयमाना" एक अँधा दुसरे अंधे को पार करा रहा है, सभी गड्ढे में गिर जायेंगे। हरे कृष्णा। थैंक यू वैरी मच।

पशु जो होता है चार पैर वाला, वो तीस लाख किस्म का होता है। और मनुष्य जो होता है वो चार लाख किस्म का होता है। तो मनुष्य जाती बहुत ही कम है। और सब जानवर जितने हैं जल से शुरू करके आकाश तक खेचर, भूचर, जंगम, स्थावर, उनको नंबर ज़्यादा ह। तो भगवान सब को खाने को देता है वो जो जल का जानवर है, स्थल का जानवर है, हाथी है, शेर है, सबको भगवान खाने को देता है।

नित्यो नित्यनाम चेतनः चेतनानाम
एको बहुनाम विदधाति कामान

ये वेद में कहते हैं की ये जो नित्य वस्तु है भगवान और भगवान जैसे चेतन वस्तु मैं भी चेतन वस्तु। अभी भगवान से हमसे फरक क्या है? भगवान सबको खाने को देता है और हम खाने के लिए भटकता है। ये इतना ही फरक है बस। और ये मुर्ख लोग कहते हैं मैं भगवान हूँ। देयो सब को खाने को देयो। अपना परिवार को तो खाने को नहीं दे सकते हो, सन्यास लेके बाहर चले जाते हो और भगवान बन गया। ये सब मूर्खता है। "एको बहुनाम विदधाति ये जो चौरासी लाख योनि जीवात्मा जो ब्रह्मण कर रहे हैं, सब के लिए खाने का, सोने का, आहार, निद्रा, भय, मैथुन, उनका सब व्यवस्था भगवान करते हैं। एको बहुनाम विदधाति कामान, इसलिए भगवान कहते हैं "एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय" योनिनी चौरासी लाख योनि सब के सृष्टि, स्थिति, प्रलय जो कुछ है वो मैं उसको करने वाला हूँ। ये भगवान, इसका नाम भगवान। "एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगत:" सारा विश्व ब्रह्माण्ड "अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा" उसको सृष्टि, स्थिति, प्रलय जो कुछ होने वाला है भगवान उसका कारण है। इसलिए भगवान का नाम है "सर्व कारण कारणं"। सब कारण के कारन। साधारण सृष्टि करते हैं ब्रह्माजी और स्थिति करते हैं विष्णु, और प्रलय करते हैं शिव, महादेव, तीन गुण का मालिक। जैसा गोवेनमेंट में एक-एक डिपार्टमेंट में डायरेक्टर रहते हैं, इसी प्रकार जब ये सृष्टि होती है जो ऑफिशिअल डायरेक्टर जो होते हैं ब्रह्मा, विष्णु, महेश। ब्रह्माजी का काम है सृष्टि करना। विष्णु का काम है उसको पालन करना। पालन तो ब्रह्मा भी नहीं कर सकते और शिवजी भी नहीं कर सकते। "एको बहुनाम विदधाति कामान" वो विष्णु। तो ब्रह्माजी सृष्टि करते हैं और विष्णु पालन करते हैं और शिवजी का काम है ध्वंस करना। जब इसको ध्वंस का ज़रुरत होता है, वो शिवजी का काम है। जब कोई मकान बनता है और उस माकन का कोई पालन करता है और कोई माकन तोड़ता है जैसे आप लोग जानते हैं। इसी प्रकार ये जो मकान है विश्व ब्रह्माण्ड , इसको तैयार करने वाला ब्रह्माजी है और इसको पालन करने वाला विष्णु और इसको तोड़ डालने वाला शिवजी, महेश। ये काम चलता है "भूत्या भूत्या प्रलीयते"। ये जो जगत है, भौतिक जगत, इसी प्रकार सृष्टि होती है, कुछ दिन ठहरती है फिर प्रलय होती है। तो जैसा कोई भी हमलोग होये एक मकान में आप गए और कुछ दिन ठहरा और समय आया की चलो जी इस मकान से निकलो, ये मकान तोड़ी जाएगी। इसको तोड़ने वाला है तो आपको ठीक लगता है क्या। देखो जी एक मकान में गया वो भी तोड़ दिया और एक मकान में गया ये भी तोड़ दिया। एक अपना मकान बना लेता तो ठीक होता। ये जैसा भीतर में विवेचना होता है। इसी प्रकार हमको समझना चाहिए की ये जो हमको शरीर मिलता है, भौतिक शरीर एतद योनि मे।, चौरासी लाख योनि में हमको ब्रह्मण करना पड़ता है। किसको किस तरह से बंद किया जाये, वो बुद्धिमान का काम है। और नहीं तो चलो सर आप तो सेठजी बन गया है और कल सूअर बन गया परसों इंद्र बन गया और उसका बाद चींटी बन गया "भूत्या भूत्या प्रलीयते"। एक शरीर मिलता है, कुछ दिन ठहरता है, फिर तोडा जाता है, फिर अपना कर्म का अनुसार और एक शरीर मिलता है, वो भी कुछ दिन ठहरता है फिर तोडना पड़ता है, ये काम चल रहा है। बाकि हमलोग जो मुर्ख हैं नहीं जानते हैं। इसलिए आचार्य से शिक्षण लेना चाहिए जो जैसे चैतन्य महाप्रभु कहते हैं की;

यई रुपे ब्रह्माण्ड ब्रंहिते कोन भाग्यवान जीव
गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाया भक्ति-लता-बीज

इसी प्रकार ब्रह्मण कर रहे हैं नाना योनि औअर ऐसे ही ब्रह्मण करते-करते यदि कोई भाग्यवान होये तो उसको ठीक-ठीक गुरु मिल जाता है कृष्ण का इच्छा से और वो कृष्ण को मिला देता है। कृष्णा गुरु को मिला देते हैं और गुरु कृष्णा को मिला देते हैं, गुरु कृष्णा कृपा। जो ये समझते हैं की देखो जी ये बड़ा झंझट है ये एक-एक बार जन्म लेना फिर मरना इसका कोई उपाय है, भगवान कोई उपाय बताइये। जो वास्तविक भगवान से प्रार्थना करते हैं उसके लिए भगवान अच्छा गुरु उनको मिला देते हैं। इसलिए कहते हैं गुर कृष्णा कृपा। दोनों का कृपा चाहिए, भगवान की कृपा और गुरु की कृपा। तब ये भूत्या भूत्या प्रलीयते, एक-एक बार जन्म लेना और मरना ये बंद हो सकता है। भक्तिलता बीज, और किस तरह से, वो भक्तिलता बीज। भगवद भक्ति द्वारा। तो भगवान कहते हैं "एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय अहं कृत्स्नस्य"। देखिये भगवान सब जगह में अहम् किया, मैं। "माम एव ये प्रपद्यन्ते" सर्व धरमां परित्यज्य माम् एकम"। ये सब जो व्यवहार अहम् माम भगवान अपने को बताते हैं। "अहम् सर्वस्य" "अहम् कृष्णस्य प्रभवः प्रलयस तथाः"। तो क्यों आप क्यों हो गया, और कोई नहीं? ब्रह्मा, विष्णु, शिवा सब बड़े-बड़े देवता हैं, कोई पूछ सकता है, जैसा मुर्ख लोग अभी भी पूछता है कृष्णा अकेले क्यों भगवान हो जायेंगे? हमारा और एक भगवान है, अवतार है, दाढ़ी वाला भगवान है वो अवतार है, एक बालक अवतार है, ये सब अवतार आज कल रस्ते-रस्ते में घूमते हैं। तो ये भगवान कृष्णा क्यों अकेले भगवान हो जायेंगे? वो बोलेगा की आपलोग कृष्ण को मान सकते हैं, बाकि हमारा मत अलग है। हमारा भगवान अलग है। ये जो बोलता है। ये मुर्ख जानता नहीं की जो वास्तविक कृष्ण क्या चीज़ है। इसलिए कृष्णा स्वयं कहते हैं "मत्तः परतरं नान्यत" परतर और मुझसे बढ़करके ऊँचे पोजीशन में न अन्यत, और कोई है नहीं। भगवान का समान भी और कोई है नहीं और भगवान का ऊपर वाला भी और कोई है नहीं। सब नीचे वाला। तो इस लिए भगवान का और एक नाम है असमौरध्व। जब भगवान विराट रूप अर्जुन को दिखाया था, उस समय अर्जुन ने बताया की आप असमौरध्व। आपका समान भी कोई है नहीं और आपका ऊपर भी कोई है नहीं। तो भगवान खुद भी कहते हैं "मत्तः परतरं नान्यत किंचिद अस्ति धनञ्जय"। और कोई परतत्त्व है नहीं। तो जो बुद्धिमान है वो कृष्ण को ही पकड़ के रहते हैं, उनके चरणारविन्द को पकड़ के रहते हैं। तो बस इतना अगर हमलोग समझ जाएँ की कृष्णा से बढ़कर और कोई है नहीं, बस कृष्ण का चरण पद्म जो है उनको हम अच्छी तरह से पकड़ लें। और भगवान कहते हैं "मां एव ये प्रपद्यन्ते मायाम एताम" बस उसी वक्त मुक्त हो जायेंगे। माया से मुक्त होना इसका नाम है मुक्ति। और कोई अगर समझ लिया ठीक-ठीक से की कृष्णा से परतत्त्व है नहीं और कृष्ण का चरण में प्रपन्न हो गया; वो जल्दी नहीं होता है "बहुनाम जन्मनाम"। जल्दी होये तो बड़ा बुद्धिमान है। जैसे भगवान कहे हैं "मत्तः परतरं नान्यत" और मुझसे कोई परतत्त्व है नहीं, फिर हम दुसरे का क्यों भजन करें। क्यों न कृष्ण को ही केवल भजन करें। मां एकम, ये बुद्धिमान का काम है। और जो अभूद्यया, "मन्नते मां अभूद्यया" भगवान ऐसे कहते हैं की "अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धय"। ये जो मुर्ख लोग होते हैं वो कहते हैं की ये जो परतत्त्व है वो निराकार है। और वो निराकार जब अपना सगुण, ये सततं, सब तरह से तमः से शरीर करता है उसका नाम है भगवान। तो उसका जवाब भगवान देते हैं; "अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धय"। उसका बुद्धि को है, लेस्स इंटेलीजेंट, पुअर फण्ड ऑफ़ नॉलेज। वो कहते हैं की भगवान निराकार है, अभी ये सगुण हो करके साकार हो करके आएगा। ये कौन बोलता है अभूद्यया, जो भागवत तत्त्व जानते ही नहीं, वो बोलता है। भगवान खुद कहते हैं, कृष्णा "मत्तः परतरं नान्यत" और कोई परतत्त्व है नहीं। मत्तः परतरं और सब शास्त्र में भी कहते हैं की तत्त्व वस्तु क्या चीज़ है। तत्त्व वस्तु "वदन्ति तत्त तत्त्व विदस तत्त्वं" जो तत्त्व वित् है, तत्त्व को जानने वाले हैं, वो उस चीज़ को तत्त्व कहते हैं क्या चीज़ है "वदन्ति तत् तत्व-विदस तत्त्वं यज ज्ञानं अद्वयम्" जो की अब्सोल्युट नॉलेज। अद्वयय ज्ञान, वो क्या चीज़, "ब्रह्मेति परमात्मेति भगवान् इति शब्द्यते"। वो तत्त्व वस्तु जो है अपना बुद्धि का अनुसार, कोई कहते हैं निराकार ब्रह्मा, कोई कहते हैं परमात्मा, और जो असल है कहते हैं भगवान। आखरी में भगवान। जैसे सूर्य भागवत तत्त्व ज्ञान आप का थोड़ा अगर दिमाग हो तो लगाइएगा बहुत जल्दी मालूम हो जायेगा। देखिये आपका सामने सूर्य जो है और सूर्य का किरण भी है और सूर्य का भीतर भी लोक है, जो कहीं पृथ्वी ये एक लोक है, बहुत आदमी हैं, इधर राजा है इसी प्रकार सूर्य लोक जो है उधर का जो राजा है उसका नाम है सूर्यनारायण साधारण नाम। अभी जो सूर्यनारायण है उसका नाम भी है भगवद-गीता में बताये हैं विवस्वान।

विवस्वान मनवे प्राह
मनुर ईक्षवाकवे 'ब्रेवित

ये सब शास्त्र में दिया है। अभी जो उधर गवर्नर है इसका नाम है विवस्वान। तो सूर्यनारायण उसका तेज है, तेजोस्मी। वो तेज सारा विश्व ब्रह्माण्ड में फैला हुआ है और उसका नाम है सूर्यकिरण। अभी विवेचना कीजिये की वो सूर्य बड़ा है न की सूर्यनारायण बड़ा है। कोई कहेगा सूर्यकिरण बड़ा है। नहीं, सूर्यनारायण बड़ा है। क्यूंकि किरण कहाँ से आता है? जहाँ से किरण आता है वो ही तो बड़ा होगा। नहीं, हमलोग, ये जो प्रत्यक्षवादी है वो इसी को जानते हैं। इसी प्रकार भगवान का जो अंग ज्योति है, जैसे सूर्यनारायण का किरण है, इसी प्रकार भगवान का भी एक अंग ज्योति है जिसका नाम है ब्रह्मज्योति। इसलिए भगवान कहते हैं "ब्राह्मणो ही प्रतिष्ठाहम"। ये जो निराकार ब्रह्म है उनकी प्रतिष्ठा मैं हूँ। क्यूंकि हमारा अंग से ये ज्योति निकलती है। और ब्रह्म संहिता में कहते हैं "यस्य प्रभा प्रभवतो जगद्-अण्ड-कोटि-" ये सब विचार है। बाकि मुर्ख लोग जो नहीं समझते हैं , मैं मुर्ख नहीं कहता, भगवान कहते हैं, "अवाजानन्ति माम् मूढ़ा" मुर्ख लोग, मूढ़ा, "मानुशीम तनुं आश्रितः" क्यूंकि ये जगत को कृपा करने के लिए हम मनुष्य जैसे लीला कर रहा हूँ। मनुष्य जैसे नहीं, मनुष्य पार नहीं कह सकते हैं। बाकि ऐसे मालूम होता है कृष्णा बृन्दावन में मनुष्य लीला कर रहे हैं, द्वारका में। बाकि मनुष्य है नहीं। जब ज़रुरत होता है प्रभावत्ता दिखते हैं। सात वर्ष का उम्र में पहाड़ को उठा लिया, सोला हज़ार को शादी कर लिया, ये क्या मनुष्य से हो सकता है क्या? और क्यूंकि मनुष्य से हो नहीं सकता है, जो मुर्ख मनुष्य है, वो कहता है की ये सब मिथ्या है जी। ये कभी हो सकता है? जब उसके दिमाग में घुसता नहीं तो कह देता है मिथ्या। तो ये सब चलता है। इसलिए भगवान खुद आ करके समझाते हैं। अगर हमारा दिमाग ठीक है तो इसको पकड़ लो।अब समझ गया भगवान को तो फिर क्या बात है। "त्यक्त्वा देहम पुनर जन्म नैति मां इति कौन्तेय"। ये सब बातें हैं। भगवान कहते हैं:

मत्तः परतरं नान्यत
किंचिद अस्ति धनं-जय
मई सर्वं इदं प्रोतं
सुत्रे मणि-गन्ना ईव

जैसा मणि का हार होता है, वो सूत्र में हज़ारों मणि आप लगा दीजिये, गांठ दीजिये। इसी प्रकार दुनिया में जो कुछ है, उसका सूत्र जो है, मूल जो है "अहम् सर्वस्य प्रभवो" मूल पुरुष जो है वो "गोविन्दम आदि पुरुषं" वो जो आदि पुरुष है वो भगवान कृष्ण है। इसलिए भगवान खुद बताते हैं, शास्त्र भी इस प्रकार से समझना चाहिए की जो भगवान बता रहे हैं। इसलिए हमारा जो भगवद-गीता है, मैकमिल्लन कम्पनी इसको पब्लिश करता है। वो मैकमिलन कंपनी का जो ट्रेड्स मैनेजर है, वो कहते हैं की ये जो भगवद-गीता है इसको सेल बहुत बढ़ती है और सब भगवद-गीता का सेल कम हो गया है। और एक-एक वर्ष में एक-एक एडिशन निकलता है। कम-से-कम पच्चास हज़ार लाख बेच सकता है। तो क्यूंकि हमलोग भगवद-गीता एस इट इस प्रेजेंट किया है, इसका मांग भी बहुत ज़्यादा है। ये असल चीज़ है न। कोई भी असल चीज़, असल सोना होये, असल दूध होये, तो उसको ग्राहक बहुत जल्दी मिल जाता है। और मिलावटी, नक़ल, उसको कैनवास करके बेचने पड़ेगा। तो असल जो भगवान है उसको तो जल्दी स्वीकार कर लेते हैं चाहे इस देश में या प्रदेश में। और नक़ल भगवान को कोई स्वीकार नहीं करता है। दो-चार दिन स्वीकार करेंगे, फिर लात मारकर फ़ेंक देंगे। ये समझना चाहिए। :मत्तः परतरं नान्यत

किंचिद अस्ति धनं-जय

सर्व कारण; जो ब्रह्म संहिता में कहा है "सर्वकार कारणम" वो ही भगवान खुद भी कहते हैं; मई सर्वं इदं प्रोतं

सुत्रे मणि-गन्ना ईव

तो भगवान मूल कारण हैं "गोविन्दम आदि पुरुषं तमहं भजामि" इसलिए ब्रह्माजी कहते हैं गोविन्द आदि पुरुष मैं उसको भजन करता हूँ। और ये ब्रह्म संप्रदाय है, ये जो हमलोग गौड़ीय संप्रदाय है। ब्रह्मा से मध्वाचार्य और मध्वाचार्य से गौड़ीय चैतन्य महाप्रभु। मध्वाचार्य संप्रदाय में माधवेन्द्र पूरी , उनका शिष्य है ईश्वर पूरी और उनका शिष्य है श्री चैतन्य महाप्रभु। और श्री चैतन्य महाप्रभु का परंपरा से हमलोग हैं। तो इसको कहा जाता है "एवं परंपरा प्राप्तम इमं राजर्षयो विदुः"। तो भागवत तत्त्व ज्ञान लाभ करने के लिए वो परंपरा सूत्र से लेना चाहिए। अपना मन माफिक "मैं ऐसा समझता हूँ"। अरे तुम क्या समझने वाला, तुम्हारा क्या दिमाग है? जैसी बड़े-बड़े आचार्य लोग समझे हुए हैं, चैतन्य महाप्रभु जैसे समझे हुए हैं, रामानुजाचार्य जैसे समझे हुए है, मध्वाचार्य, उस तरह से समझो। अर्जुन जैसे समझे हुए है उस तरह से समझो। तुम्हारा क्या दिमाग है? कोई कह दिया हमारा मत में, अरे तुम्हारा मत का के मूल्य है? बाकि एहि चलता है। हमारा मत, और एक हमारा मत, और कोई जो हमारा मत। कौन सा मत ठीक है? नहीं, वो बोलते हैं सभी मत ठीक है। "यतो मत ततो पथ" जितना मत है सब ठीक है। ये बेवकूफी चलता है। तो ये सबा बेवकूफी छोड़ करके जैसे भगवान बताते हैं उस प्रकार ग्रहण कीजिये, उसमे लाभ होगा, उसमे उपकार होगा, और जीवन सफल होगा। और नहीं तो भटकते ही रहेंगे बस। "मत्तः परतरं नान्यत किंचिद अस्ति धनञ्जय" ये भगवान खुद कहते हैं और अर्जुन भी मानते हैं और बड़े-बड़े ऋषि व्यासदेव, नारद। व्यासदेव भागवत लिखा "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" उसका टिपण्णी लिख रहे हैं क्यों श्रीधर स्वामी, जिव गोस्वामी, बड़े-बड़े सब विद्वान कृष्ण को मानते हैं "कृष्णस तू भगवान स्वयं"। ये ही विचार है सब आचार्य लोग। ये सब छोड़ करके कहीं से एक गधा आ गया, उसका विचार लेने से क्या लाभ होगा? बड़े-बड़े आचार्य लोग का विचार छोड़ करके, ये कहीं से कोई आ गया मुर्ख और कोई कह दिया मैं भगवान है, भगवान का अवतार है, उसको मानने से क्या लाभ है? अरे तुम तो भगवान का अवतार है, मैं तो खुद भगवान को भजन करता हूँ, तो अवतार से हमारा मतलब क्या है। तुम झूट हो सकते हो, बाकि कृष्ण तो झूट नहीं है। सब कोई मानते हैं। कृष्णा को ही न पकड़ लें, ये बुद्धिमान का काम है। दूसरा को हम पकड़ने का क्या ज़रुरत है। नहीं, हमारा जो बदमाशी है वो सब सपोर्ट करेंगे, इसलिए उसको भगवान मानेंगे और कृष्ण को सपोर्ट नहीं करेंगे। कृष्णा कहते हैं;

तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान्
क्षिपाम्यजस्रमश‍ुभानासुरीष्वेव योनिषु

जो भगवान को हिंसा करते हैं, भगवान कहते हैं मैं उसको अजश्र योनि में भेज देता हूँ। इसलिए कृष्ण भगवान , सुको नहीं। जो और जो भगवान का अवतार हैं, धोका देने वाला, उसको हम मरेंगे। बाकि जो बुद्धिमान है वो ये भगवद गीता का कृष्ण को मानेंगे। "मत्त: परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय" फिर भगवान साधारण के लिए समझा रहे हैं की जो जल्दी भगवान को समझ नहीं सकोगे। तो भगवान तो पहले बता दिया जो कुछ है भौतिक प्रकृति और चित प्रकृति ये सब हमारी शक्ति है। प्रकृति तब किस तरह से सब जगह से सब चीज़ से भगवान का अनुभव किस तरह से करना है, वो भगवान खुद समझा रहे हैं। सब चीज़ जब भगवान से ही, जैसे उधारण स्वरुप ये दुनिया में भौतिक जगत में जो कुछ चीज़ है, ये सूर्य किरण का परिवर्तन है। ये साइंटिफिक, वैज्ञानिक हिसाब। देखिये जिस-जिस में सूर्य किरण नहीं होता है, होता नहीं मने कम होता है, जैसा पाश्चात्य देश, मैं तो सब जगह में ब्रह्मन किया, जहाँ सूर्य किरण नहीं होता है, विशेष करके शीत काल में, सब पत्ती झड़ जाती है। आपलोग जानते हैं जहाँ बर्फ गिरता है। क्यूंकि सूर्य किरण है नहीं, वो सब ब्यूटी, जो वेजीटेशन, ग्रीनेस सब नष्ट हो जाता है। तो ज्यादा सूर्य किरण जहाँ होता है, वो तो डेजर्ट हो जाता है, मरभूमि हो जाता है और सूर्य किरण जहाँ ठीक-ठीक होता है, उधर पानी नहीं बरसता है और उधर हरियाली रहता है। ये सब दुनिया जो है, सब सूर्य किरण का सृष्टि से। जितना अलग प्लेनेट है, इसलिए सूर्य का नाम दिया है;

यच चक्षुर एषा सविता सकल-ग्रहाणां

राजा समस्त-सुर-मूर्तिर अशेष-तेजः राजा, ये सूर्य किरण से जितने प्लेनेटरी सिस्टम हैं, लोक, ये जो वैटलेसन्स है, जो ग्रह, लोक हवा में घूमती-फिरती है ये भी सूर्य किरण के लिए। वो सूर्य किरण का गर्मी से वो घूमता-फिरता है ,ये सब साइंटिफिक है ,तो इसी प्रकार, एक तरफ से आप समझ लीजिये सभी सूर्य किरण का ही एक-एक विकार है, जो कुछ दुनिया में। इसी प्रकार यदि भगवान सब का विकास का कारण है, तो किस तरह से मैं भगवान को मैं अनुभव कर सकता हूँ, ये ही सब भौतिक विचार से वो भगवान खुद हमको बता रहे हैं। क्या बता रहे हैं? "रसोहं अप्सु कौन्तेय" तुमको हम त्रिभुवन मुरारी, द्विभुज मुरलीधर कृष्ण को अगर भगवान मानने में तुम्हारा आपत्ति है, तो इस तरह से भगवान को समझो। क्या है? ये जो पानी, इसका जो रस है, इसमें जो शांति मिलती है, नहीं तो हमलोग सब रस का पीछे जाते हैं। द्वादश प्रकार रस होता है। वो रस का पीछे हमलग सब फंसे हुए हैं। बाकि रसो वई स, वेद में कहते हैं; सब रस का आधार कृष्ण। और जीव गोस्वामी भक्ति रसामृत सिंधु में भी बताये हैं "अखिल रसामृत सिंधु", सब रस के आधार हैं। तो सब रस का आधार होने का कारण, ये जो जल है उसमे भी भगवान कहते हैं इसमें जो रस है; जल क्यों पिया जाता है? उसमे कुछ रस है इसलिए तो हमलोग पीते हैं। जब बहुत प्यास लगता है तो जल चाहिए, जल दीजिये। सब जीव-जंतु, सभी जानवर भी जल पीते हैं, कीट-पतंग सब जल, वृक्ष सब जल चाहिए। वृक्ष केवल जल पिके ही रहता है। तो जल बहुत ही जरूरी चीज़ है। इसलिए भगवान कहते हैं उसमे जो रस है, आस्वादनीय वस्तु, उसका जो एक्टिव प्रिंसिपल है, वो मैं हूँ। "रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययो" ये जो शशि, सूर्य है, चंद्र और सूर्य, इसका जो किरण है वो मैं हूँ। तो क्यों ये लोग झूट बोलता है की मैं भगवान को देखा नहीं। आप भगवान को दिखा सकते हैं। भगवान तो खुद दिखता है की देखो न। अगर तुम आँख मूँद के रहोगे तो तुमको कौन दिखायेगा। भगवान खुद कहते हैं ये जो रस, पानी का जो रस है, जल का जो रस है मैं हूँ। तो जब पानी पियो तो उस समय क्यों न भगवान का स्मरण करो। जो देखो जी कृष्ण भी भगवद-गीता में बताये हैं ये जो जल का रस है ये भगवान कृष्ण हैं। तो हमारा स्मरण तो हो जायेगा। बात भी तो ठीक है। तो कृष्ण दर्शन क्या केवल ये इधर आके होता है? नहीं। "गोलोक एव निवसति अखिलात्मा-भूतो"। जिसको बहुत भाग्य होता है वो तो गोलोक वृन्दावन में जा करके(audio stopped)