731115 - Lecture SB 01.02.10 Hindi - Delhi
A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada
Prabhupāda:
- kāmasya nendriya-prītir
- lābho jīveta yāvatā
- jīvasya tattva-jijñāsā
- nārtho yaś ceha karmabhiḥ
- (SB 1.2.10)
So, our foreign students will excuse me I promised to speak in Hindi this night.
(Hindi)
Thank you very much. Hare Kṛṣṇa. (end)
HINDI TRANSLATION
प्रभुपाद:
कामस्य नेन्द्रिय-प्रीतिर् लाभो जीवता यावता जीवस्य तत्त्व-जिज्ञासा नार्थो यशेह कर्मभिः (SB 1.2.10) तो, हमारे विदेशी छात्र मुझे माफ़ करेंगे, मैंने आज रात हिंदी में बोलने का वादा किया था। कल का ही एक सज्जनअनुरोध किया है की अगर पांच मिनट आप हिंदी में बोल दे। पांच मिनट नहीं एक मिनट हिंदी में बोलूंगा। हिंदी में बोलने में ज्यादा अभ्यास नहीं है। भी बांग्लादेश का है परन्तु थोड़ा बहुत टूटी-फूटी बोल लूँगा। तो आपलोग भाव से ग्रहण कीजियेगा, भाषा से नहीं; भावार्थ। "भाव ग्राही जनार्दनः" भगवान भी किसी के भाषा से संतुष्ट नहीं होते हैं, "भाव ग्राही जनार्दनः"। तो श्रीमद भागवत सुता गोस्वामी बता रहे हैं तो इन्द्रिय तर्पण, ये जो सब हमारे इन्द्रिय हैं, इनके लिए तो कुछ भोग चाहिए। बिलकुल शुष्क कर देने के लिए ये हमारा प्रेस्क्रिप्शन नहीं है। दो-चार शब्द तो अंग्रेजी में आ ही जायेगा। तो कामस्य नेन्द्रिय-प्रीतिर्, परन्तु इन्द्रिय को संयम करने पड़ेगा। क्यूंकि मनुष्य जीवन का काम ही है इन्द्रिय संयम। ये ही विशेषता है पशु से और मनुष्य से इतना ही फरक है। एक कुत्ता है रास्ता में ही स्त्री संगम करता है। उसको संयम शक्ति नहीं है और उसको बोलने से भी कुछ फायदा नहीं है क्यूंकि वो पशु है। परन्तु एक मनुष्य ही ऐसा स्त्री संगम करे तो उसको उसी वक्त पुलिस अरेस्ट करेगा और शाशन होगा। कानून भी है क्यों ये मनुष्य है और वो पशु है। तो जितना कानून है ये सब मनुष्य के लिए है। ये जितना किताब है ये सब मनुष्य के लिए है, ये एडुकेशन, शिक्षा मनुष्य के लिए है, पशु के लिए नहीं। इसलिए कामस्य नेन्द्रिय, काम जरूर हमलोग का है। ये दस इन्द्रिय है उसकको तो कुछ देना ही पड़ेगा। इसलिए शास्त्र का निर्देश है। शास्त्र का निर्देश जैसा गवर्नमेंट, जो शराब पियेगा उसके लिए एक शराब का दूकान लाइसेंस देकर के खोल देगा। और कानून है की शराब जहाँ-कहाँ में नहीं पी सकते हो। ये दूकान में आओ और शराब पियो। जब मांस खाने की इच्छा है, इसलिए शास्त्र में कहते हैं मांस खाओ। मना करने से सुनेगा नहीं। वो तो राक्षस है। राक्षस को मना करने से क्या सुनेगा। नहीं सुनेगा। इसलिए शास्त्र का अधीन से लो जी हाँ मांस खाओ। किस तरह से खाओ। ये काली पूजा। माताजी, ये कालीजी को पूजा करो और उसमे एक छाग को बलिदान दो, वो मांस तुम खाओ। रास्ता से ये दूकान से खरीद कर के, ये कसाई के जो मांस है, विथा मांस नहीं। ये शास्त्र का नियम है। और इसी प्रकार स्त्री संघ करने की इच्छा है "लोके व्यवायामिषमद्यसेवा नित्या हि जन्तोर्न हि तत्र चोदना" जंतु मात्र का तीन चीज़ उसके भीतर में है। उसको सीखाने की यूनिवर्सिटी की कोई जरूरत नहीं है। क्या चीज़ व्यवाया स्त्री संघ करना इसके लिए कोई सीखाने को नहीं पड़ता है, सब कोई जानता है। स्त्री संघ करना व्यवाया। और मांस खाने की इच्छा, ये भी सब के भीतर है। कर मद्यादि सेवन। नाशवान करना। नित्या हि जन्तोर्न, ये सब के भीतर में है इसलिए ये भौतिक जगत में आये हैं ये सब भोग करने के लिए। ये कोई आश्चर्य बात नहीं है। बाकि इसको कण्ट्रोल करना ही मनुष्य का काम है। "प्रवृत्तिर एषा भूतानां निवृत्तिस तु महा-फला" प्रवृत्ति ये सब है, उसको जो निवृत्ति कर सकता है, वो जीतना, उसका नाम है जितेन्द्रिय। इसीलिए योग, तपस्या, ब्रह्मचर्य, धर्म, कर्म, जो कुछ शास्त्र में बताया है और कुछ नहीं है, मतलब है उसको किस तरह से ये सब काम से रोकना है और कुछ नहीं। इसलिए शास्त्र में कहते हैं "कामस्य नेन्द्रिया प्रीति" काम जरूर है। भगवान भी कहते हैं "धर्म अविरुद्ध कामोस्मि" जो धर्म शास्त्र में बताया है, उस प्रकार काम मैं हूँ। जैसे शास्त्र में कहते हैं "पुत्रार्थे क्रियते भार्या" भार्या विवाह; कुत्ता स्त्री संघ करते हैं, और एक लम्पट भी स्त्री संघ करते हैं। तो इसमें शादी-विवाह में ढोल बजा के क्या जरूरत है। जैसे वेस्टर्न कंट्री वो लोग सब ढाल-ढोल बजा के शादी में करने का परवाह नहीं करते हैं। क्यूंकि वो समझते हैं की ये भी स्त्री संघ है और वो भी स्त्री संघ है तो विवाह आदि का क्या जरूरत है। बाकि असल में मतलब है शास्त्र का की विवाह हो और उसका कारण एहि है की वो एक स्त्री से संपर्क रखे। ऐसे कुत्ता-भेड़ि के जैसे, सूअर के जैसे जिसको जहाँ मिले किया, कोई परवाह नहीं स्त्री संघ करो। उससे रोकने के लिए, और कुछ नहीं। उसको प्रवृत्ति है। उसको एकदम बंद कर देने से वो तो मानेगा नहीं। इसलिए उसको; वो जैसे उदाहरण आपको दिया जैसे शराब पीने वाला है वो तो शराब पियेगा ही। इसलिए गवर्नमेंट उसको एक दूकान खोल देता है की जो शराब पीने वाला है की भाई इधर शराब पियो, इधर से शराब खरीदो। आजकल गोवेनमेंट का बिज़नेस हो गया है। देखता है की शराब तो पियेगा, तो मैं क्यों बिज़नेस को छोड़ता है। ये पालिसी हो गया है। बाकि उच्चित नहीं है। गोवेनमेंट को नहीं चाहिए की इसको उत्तेजित करना। खैर गोवेनमेंट करता भी है तो वो नियम से। इसी प्रकार हमलोग का जो काम भावना है; आहार, निद्रा,भय, मैथुन इसको नाम है काम, इसको नियमित करना। "कामस्य नेन्द्रिय-प्रीतीर लाभो जीवेता यावता" जो कामना है आहार, निद्रा,भय, मैथुन इसको सीमित करो। जितना चाहिए उतना, ज्यादा नहीं। इंडिया चाहता है हमें खाने की इच्छा है; अभी घर से खाके निकला है और देखा एक रेस्टोरेंट में चोप-कटलेट बिक रहा है चलो जी एक प्लेट खा लेते हैं। इस प्रकार नहीं की जिह्वा डिक्टेट कर दिया, आप दे दिया, चलो जी चोप-कटलेट खा लें। अभी भोजन करके आया है घर से, पेट भरी हुई है फिर खाएंगे। चोप-कटलेट खाने का क्या जरूरत है। चोप-कटलेट खाने से कोई ज्यादा तंदरूस्त होता है? नहीं, वो स्वभाव हो गया। इसी प्रकार सिगरेट पीने से कोई ज्यादा लाभ होता है? अमेरिका में ये कानून है की सिगरेट का पैकेट के ऊपर लिख देता है की ये बड़ा खतरनाक है, इसमें बड़ा दोष है, ये पीने से तुम्हारा बहुत हर्ज़ा होगा लिख देता ही तभी पीता है और सिगरेट का एडवर्टिसमेंट भी चलता है। इसी प्रकार आप वेस्टर्न कंट्रीज में, पाश्चात्य देश में आप रास्ता से देखिएगा की केवल ऐडवर्टाइज़मेंट ये सिगरेट का, शराब का औअर औरत का, बस। अविगढ़ स्त्री संघ, नशा, ये ही सब चलता है। ये शास्त्र भी मन करते हैं नहीं, जितना जरूरत है उतना ही ग्रहण करो। "कामस्य नेन्द्रिय-प्रीतीर लाभो जीवेता यावता" ये नहीं है की भूका मर जाओ। ये काम है उसको जबरदस्ती दबा करके कोई रोग को पैदा कर लो, ये बात नहीं। सीमित करके, नियमित करके, शास्त्र का अनुसार उसको भोग करो। असल तुम्हारा काम क्या है? असल काम है "जीवस्य तत्त्व जिज्ञासा"। ये ज मनुष्य जीवन है, ये केवल खाओ, पियो, मजा करो और मजा करके फिर कुत्ता, भेड़ि बन जाओ। इतना मुर्ख हो गया मनुष्य समाज वो जानता ही नहीं की मैं किधर जा रहा हूँ। शास्त्र में कहते हैं;
- अदान्तगोभिर्विशतां तमिस्रं
- पुन: पुनश्चर्वितचर्वणानाम्
"न ते विदु: स्वार्थगतिं हि विष्णुं" ये जानते ही नहीं तत्त्व जिज्ञासा। ये श्रीमद भागवद जो है ये बह्म सूत्र का भाष्य है। बह्म सूत्र, वेदांत सूत्र जो है व्यासदेव बनाया फिर वो सूत्र में है उसको अच्छी तरह से समझाने के लिए ये श्रीमद भागवद कमेंटरी है उसको भाष्य कहते हैं। "भाष्योऽयं ब्रह्म-सूत्रनाम वेदांत परिवृणित्तम" ब्रह्म सूत्र का भाष्य है। क्यों? ये भाष्य कमेंटरी लिख-लिख करके आदमी को सब विपदगामी कर देते हैं। इसलिए ख़ास करके ये जो वेदांत सूत्र है, व्यासदेव का आखरी दान है, सब वेद का जो ज्ञान है उसमे सब एकत्रित करके सरल भाषा में उसको प्रकाशित किया, फिर उसको अच्छी तरह से समझाया श्रीमद भागवतम में। ये जो वेदांत सूत्र में कहते हैं "अथातो ब्रह्म जिज्ञासा"। तो ब्रह्म जिज्ञासा और इधर बताते हैं "जीवस्य तत्त्व जिज्ञासा"। तत्त्व जिज्ञासा और ब्रह्म जिज्ञासा एक ही शब्द है। ब्रह्म ही तत्त्व वस्तु है आगे जाके समझायेंगे।
- वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं
- यज्ज्ञानमद्वयम्
- ब्रह्मेति परमात्मेति
- भगवानिति शब्द्यते
तो कहने का मतलब है की ये मनुष्य जीवन जो है ये केवल सूअर, कुक्कर के जैसे खाओ, पियो मजा करो और स्त्री संघ करके कुछ दिन बाद मर जाओ कुत्ता भेड़ि के जैसे। नहीं-नहीं ऐसी बात नहीं है। "जीवस्य तत्व-जिज्ञासा" ये जीवन का, तत्त्व जिज्ञासा। मैं कौन हूँ? ये तत्त्व जिज्ञासा ये पहली होनी चाहिए। ये जिज्ञासा जब तक किसी के ह्रदय में उदित नहीं होती है तो वो पशु ही है। इसीलिए इतना शास्त्र बनाया गया है। इसलिए समझो तुम कौन हो। तात्त्विक भाव से भगवान को समझो, तात्त्विक भाव से अपने को समझो। तात्त्विक भाव से भगवान से तुम्हारा संपर्क क्या है इसको समझो। तुम्हारा जीवन का ध्येय क्या चीज़ है इसको समझो। इसका नाम है तत्त्व जिज्ञासा। "जीवस्य तत्त्व-जिज्ञासा नार्थो यश सेह कर्मभिः" ये जो कर्मी लोग है; कर्मी का अर्थ होता है की ऐसे कुछ काम करो की जिसमे हमारा इन्द्रिय तर्पण अच्छी तरह से चलेगा। जैसा आदमी साधारणतः रूपया चाहते हैं बहुत, दिन-भर खूब परिश्रम करते हैं, क्यों, रूपया चाहिए। "दिवा चारतेहया राजन कुटुम्ब-भरणेन वा"। ये जो आजकल का मुर्ख समाज है सब भागवत में बताया गया है। "आपश्यतां आत्मा तत्त्वं", तत्त्व जिज्ञासा, उस विषय में कुछ जानता ही नहीं। आपश्यतां, अंधे हैं। "आपश्यतां आत्मा तत्त्वं गृहेषु ग्रह मेधिनाम"।
- श्रोतव्यादीनि राजेन्द्र
- नृणां सन्ति सहस्रश:
- अपश्यतामात्मतत्त्वं
- गृहेषु गृहमेधिनाम्
जैसे हमलोग बताते हैं की केवल भगवान की कथा सुनो। ये हमारा जो कृष्णा कॉन्शियसनेस्स मूवमेंट है, कृष्णा भावनामृत, डॉक्टर रओ से मैं अनुरोध करता हूँ की किताब कृष्णा भावना जो हम लिखे हैं उसको लिखिए कृष्णा भावनामृत, कृष्णा कॉन्शियसनेस्स। ये जो हमलोग का प्रोपोगेंडा है, ये हो तत्त्व जिज्ञासा है, और कुछ नहीं। तत्त्व जिज्ञासा ये भागवद-गीता पढ़ो, अच्छी तरह से समझो जैसे-के-तैसा, कुछ अदल-बदल न करो। अदल-बदल किया तो बस ख़तम। जैसी दवाई है किसी डॉक्टर से हम लिया, डॉक्टर साहेब लिख देता है उसमे डोज़; इतना बूँद पानी में मिला करके खाने से पहले पी लीजिये। तो आप अपने से उसमे अदल-बदल कर दिया। तो इतना बूँद क्यों, इतना बूँद करो। पानी से क्यों और किसी के सात पीलो। यू कन्नोट डो थाट। फिर उसमे आप का काम ठीक नहीं बनेगा। तो इसी प्रकार भगवद-गीता पढ़िए। भागवद-गीता में जैसे बता रहे हैं ऐसे पढ़िए। अपना मतलब हासिल करने के लिए भागवद-गीता नहीं पढ़िए। उसमे वास्तविक तात्त्विक ज्ञान नहीं है। और ऐसे समझिये की भगवान श्री कृष्णा वो हमारा लिए छोड़ गया है की हम इसमें कुछ हम अपना भाष्य करेंगे, अपना मतलब कुछ निकालेंगे, इसलिए छोड़ गया। ये महा मूर्खता है। जो कुछ कहने का है भगवान सभी तो कह दिया है। तुम कौन है की तुम्हारा ऊपर छोड़ दिया है भागवद-गीता समझने के लिए। एहि मूर्खता है, मुर्ख लोग एहि सब करेंगे। वो समझता है हम बहुत बड़े विद्वान है।, बहुत बड़े पॉलिटिशियन हैं, राजनैतिक है और हम ये भागवद-गीता सब कोई इससे परिचित है वो हमारा कुछ मतलब इसका भीतर घुसाओ। ये बदमाशी चल रहा है और आदमी का सर्वनाश हो गया है। वो तात्त्विक कुछ समझता ही नहीं। किस लिए भागवद-गीता है वो समझता ही नहीं और लिख रहे हैं भागवद-गीता के ऊपर भाष्य लिख रहे हैं। ये पॉलिटिशियन लिख रहे हैं, वो पॉलिटिशियन लिख रहे हैं, सब नाश कर रहे हैं। नहीं ऐसी नहीं, तत्त्व जिज्ञासा। तत्त्व जिज्ञासा शास्त्र में बताते हैं;
- तद-विज्ञानार्थं स गुरुं एवाभिगच्छेत
- समित-पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्म-निष्ठम्
ये उसका पास जाता है तत्त्व जिज्ञासा करने के लिए और भागवद-गीता में भी बताये हैं, ये कठो उपनिषद् की वाणी है और भागवद-गीता में है;
- तद्विद्धि प्रणिपातेन
- परिप्रश्नेन सेवया
- उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं
- ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः
तो तत्त्व जिज्ञासा किसके पास जाने से होगा? आप कोई पान वाला, बीड़ी वाला का पास जा करके जी हमको थोड़ा भागवद-गीता तत्त्व समझा दो , वो क्या समझायेगा। इसलिए शास्त्र बताते हैं जो "तद-विज्ञानार्थं स गुरुं एवाभिगच्छेत" की यदि आप तत्त्व वस्तु समझना चाहते हैं तो वास्तविक जो गुरु है उसके पास जाओ, उसके पास समझो, पान वाला का पास नहीं, बीड़ी वाला का पास नहीं। उससे काम नहीं बनेगा। ये बीड़ी फूंकता है, गीता पढता है। ये सब चल रहा है। भागवद-गीता बोलते-बोलते गला सूख गया लाओ जी दो बीड़ी लाओ। ये सब जो प्रोफेशनल है इसको २०००-५००० वर्ष आप सुनेंगे तो भी तत्त्व ज्ञान लाभ नहीं होगा। क्यूंकि अगर आप वास्तविक तात्त्विक ज्ञान चाहते हैं तो जैसा भगवान बताते हैं "तद्विद्धि प्रणिपातेन" यदि आप तात्त्विक ज्ञान चाहते हैं तो पहले आपको प्रणिपात, इसलिए आपको प्रस्तुत होने पड़ेगा। प्रणिपात का अर्थ होता है "प्रकृष्टे रूपेणा निपात" बिलकुल, जैसा भगवान कहते हैं "सर्व धर्मान परित्यज्य मॉम एकम शरणम व्रज" इसी प्रकार व्यक्ति को ढूंढिए जहाँ जा करके आप सम्पूर्ण प्रणिपात कर सकते हैं की महाराज आपके चरण में अपने आप को बिका दिया। ऐसे व्यक्ति को सुनिए। ढूंढना चाहिए। इसलिए प्रणिपात। अगर आप समझते हैं की ये स्वामीजी क्या जानते हैं गीता, हम इनसे बहुत ज्यादा जानते हैं, तो आप ठगाने के लिए कुछ प्रश्न कीजिये की जो कितना जानते हैं, उसमे कुछ लाभ नहीं। आप स्वामीजी को नहीं चाहते हैं, और किसी को चाहते हैं तो ऐसे व्यक्ति को ढूंढिए जहाँ आप जाकरके ख़ुशी से प्रणिपात कर सकेंगे। "तद विद्धि प्रणिपातेन" फिर परिप्रश्नेन कीजिये। जिसका पास आपको प्रणिपात है नहीं उनसे परिप्रश्न करके उनको भी समय नष्ट करना और अपना भी समय नष्ट करना, ऐसी काम नहीं, उसमे कुछ लाभ नहीं। "तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया" क्यूंकि कारण ये है की ये जो विज्ञानं है ये सेवोन्मुख में मालूम होता है। जब तक हमको घमंड रहेगा की हम तो मास्टर हैं, हम तो प्रभु हैं; जैसा महा मुर्ख लोग कहते हैं हम भगवान हैं, हम गॉड हैं। ये सब कुछ से भगवान को समझ नहीं पायेगा। क्यूंकि इनको प्रणिपात है नहीं, सरेंडर है नहीं और भगवान को समझने के लिए पहली बात है "सर्व धर्मान परित्यज्य मां एकम शरणम व्रज" प्रणिपात अपने को "प्रकृष्टे रूपेणा निपात"। जो पहले ही समझना चाहिए की हमारा जैसा मुर्ख जगत में कोई है नहीं दुनिया में। हम घमंड से ऐसी-ऐसी कर रहा था। आज से भगवान हम आपका चरण में अपने को बिका दिया। अब आप चाहिए रखिये, मारिये, जो कुछ भी कीजिये। ये बुद्धि कम होती है। ये भी भगवान भगवद-गीता में बताये हैं की "बहूनां जन्मनाम अन्ते" ये मुर्ख लोग अनेक जन्म-जन्मांतर ये घमंड में रहेंगे की हम भगवान हैं। ये अनेक जन्म ऐसा चलेगा। इसलिए ज्ञानवान। तो जब ज्ञानवान होगा वास्तविक की मैं भगवान नहीं है, मैं भगवान का दास है, उसका नाम है ज्ञानवान। और जब तक वो पाने को समझता है की मैं भगवान है उसका ऐसा मुर्ख और दुनिया में कोई है नहीं। ये असल बात है। तो इसलिए पहले अपने को प्रणिपात। ऐसे व्यक्ति भगवान के पास प्रणिपात होता है और भगवान के जो प्रतिनिद्धि, गुरु उसको प्रणिपात हो सकता है, दुसरे के पास नहीं। तो भगवान को प्रतिनिधि होना कोई मुश्किल नहीं है। जैसा कोई बिज़नेस कण्वासर होता है, बिज़नेस सिक्योर करने को कोई जाता है तो उसका मालिक बोल देता है की देखोजी ये चीज़ का इतना दाम है। तुम आदमी को समझाओ की ये चीज़ ऐसी है और इसको मिल सकता है। तो प्रतिनिधि का काम क्या है?बोलना की देखो जी ये चीज़ हमारे पास है और इसका दाम ये है और ये ऐसी है। उतना ही बोले, ज्यादा नहीं। तो इसी प्रकार भगवान का प्रतिनिधि वो ही हो सकता है जो उतना ही बोलता है जो भगवान बोलै है, और ज्यादा नहीं। ज्यादा उस्तादी नहीं। उतना ही बोलता है। वो भगवान का प्रतिनिधि है। भगवान बोलता है "सर्व धर्मान परित्यज्य मां एकम शरणम व्रज"। वो प्रतिनिधि को बोलना चाहिए की देखो जी सब छोड़-छाड़ के भगवान का चरण में शरण लो। बुआ हो गया प्रतिनिधि। कोई मुश्किल है क्या? भगवान बोलता है "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु"। बस प्रतिनिधि वोही बोले की देखो जी सब समय भगवान का चिंतन करो, भगवान का भक्त हो जाओ, भगवान की पूजा करो और भगवान को नमस्कार करो। अपने भी वोही काम करे और दुसरे को भी सिखाये, तो वो भगवान का प्रतिनिधि है। इसलिए भगवान कहते हैं की;
- मय्यासक्तमना: पार्थ
- योगं युञ्जन्मदाश्रय:
- असंशयं समग्रं मां
- यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु
तो आश्रय, मद आश्रय, भगवान का आश्रय लो। ये तो जो व्यक्ति भगवान का आश्रय लिया है, उसका आश्रय लो। "एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः", इसका नाम है प्रतिनिधि और उसका पास जा करके तत्त्व जिज्ञासा करो, ठीक-ठीक खबर मिल जायेगा, ठीक-ठीक ज्ञान मिल जायेगा, जीवन सफल हो जायेगा। इसलिए शास्त्र में बताते हैं की;
- जीवस्य तत्त्व-जिज्ञासा
- नार्थो यश चेह कर्मभिः
ये दिन भर खाली परिश्रम करना। परिश्रम करने का कोई जरूरत है नहीं। ये तो हमको सीखना चाहिए की ये जो मनुष्य जीव है, पशु-पक्षी है, वो क्या परिश्रम करते हैं। वो जानते हैं की सबेरे उठ करके कहीं वृक्ष में चला गया उनको फ्रूट मौजूद है, थोड़ा खा लिया, तो उसका आहार हो गया, फिर निद्रा का बंदोबस्त है। कोई वृक्ष में आ कर बैठ गया, कोई है बैठने का जगह,वहीँ सो जाते हैं और स्त्री संघ करने के लिए भी उसका बंदोबस्त है। जन्म का साथ-ही-स-साथ उसको स्त्री मिल जाता है और भय, वो भी भय करता है हमलोग भी भय करते हैं। वो अपने भाई को बचाने के लिए ज़मीन में नहीं बैठता है, ऊँचा में बैठ जाता है और हमलोग भी जहाँ तक बुद्धि है एटम बम बना लेते हैं। इसमें फरक क्या हुआ? चार ही काम तो हुआ।
- आहार-निद्रा-भय-मैथुनं च
- सामान्यं एतत पशुभिर नराणाम्
इससे ज्यादा उस्तादी क्या किया। आप तो बड़ा उस्ताद बन गया है, बड़ा साइंटिफिक इम्प्रूवमेंट किया है। जो असल जो बात है "जन्म मृत्यु जरा व्याधि दुःख दोषाणु दर्शनम' ये असल दुःख जो है उसके लिए आप क्या साइंटिफिक उन्नति किया है? अब ऐसा कुछ स्कैनटिफिक मेथड बनाया की जो आदमी अब मरेगा नहीं। आप ऐसे ही स्कैनटिफिक इम्प्रूवमेंट किया है एटम बम। पहले आदमी आहिस्ते-आहिस्ते मरता था, अब एक एटम बम छोड़ दीजिये, एक सेकंड में हज़ारों लाखों आदमी मर जायेंगे। ये आपका स्कैनटिफिक इम्प्रूवमेंट है। तो इसलिए तत्त्व जिज्ञासा होनी चाहिए जीवन में हमलोग क्या वास्तविक उन्नति कर रहे हैं। जीवन का क्या उद्देश्य है? कहाँ हमको जाना है? ये जो इतना भारी ब्रह्माण्ड है, रात में इतना सितारा हमलोग देखते हैं, उधर क्या होता है? ये सब तत्त्व जिज्ञासा; किधर से बनाया, कौन बनाया? किसका ब्रेन से ये बनाया? किसका ब्रेन से? ये लोग तो थिओरिटिकली कहते हैं के ये पानी जो हैं, वाटर, ये हाइड्रोजन-ऑक्सीजन इसको मिला करके पानी हमलोग बना दिए। तो इतना जो पसिफ़िक ओशन, अटलांटिक ओशन हैं, वो जो हाइड्रोजन-ऑक्सीजन कैसे मिला और पानी किधर से आया? ये सब तत्त्व जिज्ञासा। और खाया-पिया, और बाजार में गया और क्या भाव हैं पूछ लिया और तत्त्व जिज्ञासा कर लिया, इसमें कुछ फायदा नहीं। ये तो सब कर्म हैं, करने से वो बद्ध हो जाता है। कर्म का अर्थ होता है काम करो, रूपया पैसा करो और खूब मज़ा करो। तो वो जैसा आपको समझा रहा था की मज़ा आपको जितना डेस्टिनी में है उतना ही मज़ा मिलेगा, ज़्यादा नहीं मिलेगा। आपको जब शरीर मिला है सूअर का वो गूढ़ खाने का ही मज़ा मिलेगा और ज्यादा नहीं, हलवा खाने का नहीं, ये संभव नहीं है। इसलिए शास्त्र में कहते हैं;
- तस्यैव हेतो: प्रयतेत कोविदो
- न लभ्यते यद्भ्रमतामुपर्यध:
जो उसके लिए आप प्रयत्न कीजिये जो की सारा ब्रह्माण्ड में ब्रह्मण करते हुए भी आप को मिला नहीं। ये कर्म द्वारा आप को छोटा-बड़ा सभी मिल सकता है। आप ख़राब काम कीजिये तो छोटा शरीर मिलेगा और अच्छा काम करिये तो बड़ा शरीर मिलेगा। ब्रह्मा का भी शरीर मिल सकता है, देवता का भी शरीर मिल सकता है और कुत्ता का भी शरीर मिल सकता है, पेड़ का भी शरीर मिलता है। तो अपना कर्म भी। तो शास्त्र कहते हैं इसमें आप न फसिये। ये आप का कर्म का अनुसार जो आपको शरीर मिला है तो ये निश्चित हो गया की इतना सुख और इतना दुःख आपको मिलेगा। इससे ज्यादा नहीं। तो आपको इस विषय में परिश्रम करने से क्या फायदा।
- तस्यैव हेतो: प्रयतेत कोविदो
- न लभ्यते यद्भ्रमतामुपर्यध
ऊपरी अदह: ऊपर लोक है, ब्रह्माण्ड लोक तक है जहाँ की एक दिन का आयु बारह घंटा, जो भगवद-गीता में बताते हैं "सहस्र युग पर्यन्तं अर्हद य ब्रह्मणो विदुः"। ब्रह्म लोक में जो लोग रहते हैं, ब्रह्माजी रहते हैं और उधर भी ब्रह्माजी के साथ और भी सब रहते हैं तो उनका परम आयु है "सहस्र युग पर्यन्तं" ये ज हमारा युग है सत्य, त्रेता, द्वापर युग, चार युग तैंतालीस लाख वर्ष उसको हज़ार गुन कीजिये वो ब्रह्माजी का बारह घंटा। तो ऐसी ब्रह्माण्ड लोक में भी जाइये तो उधर से भी घूमने पड़ेगा "आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन" उधर भी जन्म-मरण है, ब्रह्माजी भी मरेगा। ऐसी बात नहीं है की ब्रह्माजी की इतनी आयु है, वो मरेगा नहीं। ये हिरण्यकशिपु खूब तपस्या किया और ब्रह्माजी उसके पास पहुँच गया की क्यों जी इतना तपस्या क्यों किया, क्या चाहते हो? महाराज हमको अमर बना दीजिये। अमर! हम खुद ही अमर नहीं हैं तुमको कैसा अमर बनाये? ये तो संभव नहीं है। तो और कुछ चाहते तो मांग लियो। तो वो बोलता है देखिये जी ज़मीन में नहीं मरेंगे, अच्छा ठीक है, हम पानी में नहीं मरेंगे, अच्छा ठीक है, आकाश में नहीं मरेंगे, अच्छा ठीक है, हमको कोई आदमी नहीं मार सकेगा, ठीक है, कोई देवता भी नहीं, ये भी ठीक है, कोई जानवर भी नहीं, ये भी ठीक है, कोई अस्त्र नहीं, कोई शास्त्र नहीं। वो आदमी बुद्धि से जितना हो सकता है वो सब मांग लिया। ब्रह्माजी कह दिया सब ठीक है उसको भी मरने पर। इतना विचार करके अपने को बचाने के लिए बंदोबस्त किया की ज़मीन में नहीं मरेंगे, दिन में नहीं मरेंगे, रात में नहीं मरेंगे, घर में नहीं मरेंगे, स्थल में नहीं मरेंगे, आकाश में नहीं मरेंगे, जितनी बुद्धि उनकी है। तो भगवान इतनी बुद्धिमान है की जब उसको मारा तो ज़मीन में नहीं, अपना गोद में। और वो श्याम को, संध्या का समय था, दिन भी नहीं रात भी नहीं। तो वो जो मनुष्य जो अपना बुद्धि भगवान का तरफ लगाते हैं की भगवान को हु ऊँगली दिखा देंगे, तो भगवान का बुद्धि सब समय ऊँचा ही रहता है। जितना ही करो वो तुम्हारा सब नाश कर देंगे। वो मरण तुमको मरना ही पड़ेगा। इसलिए भगवान खुद कहते हैं "मृत्यु: सर्वहरश्चाहम"। मृत्यु तो तुम अभी भगवान को नहीं चाहते हो, तो भगवान आएंगे एक दिन, तब तो तुम बचा नहीं सकोगे। वो मृत्यु रूप से आएंगे। उसमे तुम क्या करोगे, तुम्हारा साइंस क्या करेगा? तुंहारा मिनीस्टरशिप क्या करेगा? तुमको मरने ही पड़ेगा। ये बात नहीं कह सकते हो की क्यों जी हमारा पास में क्यों आये, आप जाइये। हम तो मिनिस्टर हैं, हम बड़ा साइंटिस्ट है, बड़ा फिलोसोफर है, नहीं। अभी तुमको मरने पड़ेगा। और तुम्हारा जो कुछ है यहाँ सब ख़तम। तुम्हारा विद्या -बुद्धि, मकान, और बैंक बैलेंस, स्त्री-पुत्र, सब, ये सब ख़तम हो गया। अब तुम जा करके और एक शरीर धारण करो, फिर दूसरी चैप्टर शुरू करो । फिर मकान बनाओ, फिर शादी करो, पुत्र उत्पादन करो। वो मनुष्य का शरीर भी हो सकता है और चौरासी लाख योनि है, वो तो हमलोग विचार करके तुमको शरीर देगा। इसलिए शास्त्र में कहते हैं "तस्यैव हेतो: प्रयतेत कोविदो" ये सब करके तुम्हारा कुछ फायदा नहीं है। तात्त्कालिक है। ऐसा काम करो जो जन्म-जन्मांतर में मिला नहीं। ऐसा काम करो। वो बोलते हैं हम ये सब काम छोड़ देंगे तो हमारा काम कैसे चलेगा, पेट कैसा चलेगा। तो इसलिए शास्त्र कहते हैं;
- तल्लभ्यते दु:खवदन्यत: सुखं"
- कालेन सर्वत्र गभीररंहसा
जैसा दुःख कोई नहीं चाहते हैं। कोई नहीं चाहते हैं की हमारा सर पर दुःख आ जाए। तो दुःख तो आता ही है, ये तो सब को मालूम ही है। तो इसी प्रकार जितना तुमको सुख मिलना है वो आ जायेगा। उसके लिए तुम कोशिश करो, न करो तुमको जितना सुख-दुःख मिलना है, उतना ही मिलेगा। ज़्यादा भी नहीं, कम भी नहीं। इसलिए तुम भगवद भक्ति लाभ करने के लिए चेष्टा करो, ये जीवन को सफल करो। इसका नाम है तत्त्व जिज्ञासा।
- कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता
- जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभि:
और नहीं तो ऐसे खाली जो परिश्रम करते हैं, परिश्रमी जो, कर्मी परिश्रम करते हैं उसको कहते हैं गधा, मूढा कहते हैं। लेकिन गधा यूँ नाम दिया है? क्यूंकि गधा जो परिश्रम करता है दिन भर धोबी का पास, खूब कपड़ा लादता है, चल नहीं सकता है। बस घाट में जाता है, फिर घाट में उसको छोड़ दिया, थोड़ा सा घास दे दिया। बस वो घास खता है, उधर ही खड़ा होता है, और श्याम को फिर कपड़ा लाद के ले जाता है। तो इतना मुर्ख है की देखो जी हमको थोड़ा सा घास ही देता है, ये घास तो मई कहीं भी जाऊं तो हमको मिल सकता है। ये धोबी का गधा मैं क्यों हो गया? ये उनकी बुद्धि नहीं है। इसी प्रकार कर्मी लोग जो है खूब परिश्रम करते हैं, है ये सब दिन भर और हम देखा है अमेरिका में बहुत कर्मी है, बहुत ऑफिस चला रहा है और खा रहा है क्या, दो टोस्ट और एक कप टी, बस। तो इसको ये बुद्धि नहीं होती है की हम तो इतना ही खा रहे हैं और इनके लिए क्यों इतना हम परिश्रम करते हैं। इसलिए कर्मी को गधा कहा जाता है। "न मां दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा:" भगवान का चरण में ये ही सब लोग प्रपत्ति नहीं कर सकते हैं, कौन? एक तो जो महा पापी होता है। दुष्कृति, बुद्धि खूब है। कृति बताया है; कृति का अर्थ होता है बुद्धि खूब प्रकर है, लेकिन सब दुष्कार्य में लगाते हैं। उसका नाम दुष्कृति। केवल दुनिया को हानि करने के लिए एटम बम बनाने के लिए ब्रेन खूब अच्छी तरह से लगता है। इसका नाम दुष्कृति। और मूढ़ा जो दिन भर परिश्रम करते हैं दो रोटी के लिए, और खाएंगे तो दो रोटी और हर जगह में सोयेंगे। चाहते हैं सब दुनिया हमारा पास हो जाये। जितना खाने का चीज़ है, डरने का चीज़ है सब हमारा पास हो जाये। और नराधमा। ये मनुष्य जीवन मिला है तत्त्व जिज्ञासा के लिए। "जीवस्य तत्त्व जिज्ञासा" ये मनुष्य जीवन में तात्त्विक क्या चीज़ है दुनिया में। उसको समझता नहीं है। उसको छोड़ देता है और इसको पकड़ लेता है। इसके लिए नराधमा। और यदि कहे की ये लोग तो बड़ा विद्वान् होते हैं "माययापहृतज्ञाना" तो उसको ज्ञान का कोई कीमत ही है नहीं क्यूंकि माया उसका जो ज्ञान है सब छीन लिया। असल चीज़ तो समझते ही नहीं। असल जीवन का उद्देश्य क्या चीज़ है वो तो समझते नहीं। तत्त्व जज्ञासा क्या चीज़ है उसको मानते ही नहीं। तो इसीलिए "माययापहृतज्ञाना"। क्यों ऐसी आदमी है " आसुरं भावमाश्रिता:" एथीस्टिक, नास्तिक है। वो कहते हैं भगवान-वेगवान कुछ नहीं है। इसलिए इसका नाम है आसूरम जैसे हिरण्यकशिपु, रावण। रावण भी बहुत विद्वान भी थे, ब्राह्ममण थे और खूब अपना नगर को सोना से बना लिया था, सब कुछ था। बाकि उसका एक दोष था; क्या राम है, हम उसको मानते नहीं, लाओ उसका औरत को पकड़ लिया। भगवान को नहीं मानते हैं। इसलिए उसको कहते हैं राक्षस। हिरण्यकशिपु भी ऐसे ही थे, बहुत बलवान। देवता लोग डर जाते थे। इतना बलवान, पावरफुल सब होते हुए, प्रह्लाद जी को भगवान वर देने को माँगा "बीटा तुम वर लो" तो प्रह्लाद जो भगवान से एहि बताये की महाराज आप क्यों हमको इसमें फंसा रहे हैं। हम तो ऐसे पिताजी से हमारा जन्म है जो केवल दुनिया को चाहते हैं। तो शरीर हमारा ऐसे ही है और आप का ऐसे वरदान देने के लिए कहते हैं तो हम तो इसमें फँस जायेंगे क्यूंकि हमको इसमें वर लेने का है क्या और इस वर में है क्या। हमारा पिताजी ऐसी बलवान थे की बड़े-बड़े देवता लोग काँपता था इनके बल से। इनको तो आप एक सेकंड में सब ख़तम कर दिया। ये सब चीज़ हमको ले करके क्या लाभ होगा। आप ऐसे हमको वर दीजिये की आप का जो दास है उनको चरण सेवा हम जन्म-जन्मांतर कर सके। ये असल बात है। इसका नाम तत्त्व जिज्ञासा है। तो हमलोग का जो प्रचार का विषय है कठिन है। बाकि असल चीज़ है जो भाग्यवान हुआ उसको समझ में आएगा, वो लेगा और अपना जीवन को सफल करेगा। थैंक यू वैरी मच हरे कृष्णा
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