731117 - Lecture Hindi - Delhi
A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada
Prabhupāda:
(Hindi)
This is Kṛṣṇa Consciousness movement. (end).
HINDI TRANSLATION
प्रभुपाद: आज हिंदी बोलने का बारी है। तो जीव का जो उद्देश्य है, जीवन का "जीवस्य तत्त्व जिज्ञासा"। तत्त्व वस्तु को ज्ञान लाभ करना। अभी श्रीमद भागवत में तत्त्व वस्तु किस को कहा जाता है उस विषय में बता रहे हैं। तो तत्त्वित नहीं होने से तत्त्व को क्या बताये। इसीलिए कहते हैं "वदन्ति तत्त्व विदस तत्त्वं" जो लोग तत्त्वित हैं, तत्त्व दर्शिनः, भगवान जैसे भगवद-गीता में बता रहे हैं;
- तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया
- उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः
वास्तविक बिना तत्त्व दर्शी हुए कुछ तात्त्विक बोलना उचित नहीं है। इसलिए ये गुरुदास जैसे कहते हैं की उनलेस, जब तक आपको पूर्ण ज्ञान नहीं है उस विषय में बोलना ठीक नहीं है। क्यूंकि जीव जो है, बद्ध जीव उनका चार दोष होता है। एक दोष होता है की वो, ही विल कमिट मिस्टेक्स, वो ब्रम जरूर करेगा, और प्रमाद, एक चीज़ को और एक चीज़ समझना। वो जैसे साइंटिस्ट लोग, वैज्ञानिक लोग जड़ वस्तु को जीवन समझते हैं। जैसे शरीर; ये शरीर है जड़ वस्तु कर आज कल ये जड़ वस्तु को ही समझता है आत्मा। इसका नाम है प्रमाद। एक वस्तु को दूसरा चीज़ समझना। ब्रम, प्रमाद, और विप्रलिप्सा। विप्रलिप्सा का अर्थ होता है की दुसरे को ठगाना। मैं जानता नहीं कुछ, बाकि हम टीचर बन गया। क्यूंकि हमारा पूर्ण ज्ञान है नहीं और जब हमारा पूर्ण ज्ञान है नहीं तो दुसरे को हम क्यों बताएं जो चीज़ हम नहीं जानते। तो उसका नाम है विप्रलिप्सा यानि दुसरे को ठगाना। और करनपाटवा; कर्ण का अर्थ होता है इन्द्रिय। वो अपटु है। करण, जो हमारा इन्द्रिय जैसा आँख है हम दूर का वस्तु देख नहीं सकता हूँ । तो माइक्रोस्कोप हमलोग बनाये हैं, की और कुछ सब यंत्र बनाये हैं। पर ये यंत्र भी तो मैं ही बनाया है। जब हमारा इन्द्रिय अपटु है जो यंत्र हम बनाया है वो भी अपटु है। वो परफेक्ट कैसा हो जायेगा। इसीलिए जो बद्ध जीव है, बद्ध जीव मने जो कोई इधर भौतिक जगत में आये हैं उसका नाम है बद्ध जीव। सीमित है, उसका ज्ञान, बुद्धि सब कुछ सीमित है। तो इस प्रकार व्यक्ति से ज्ञान लाभ करने से हमारा कुछ लाभ नहीं है। इसलिए तत्त्ववित्त का पास जाना चाहिए। ये भागवत में बताते हैं "वदन्ति तत्त तत्त्व विदस" जो तात्त्विक ज्ञान को लाभ किया। अच्छा तात्त्विक ज्ञान लाभ बड़े-बड़े साइंटिस्ट है, वैज्ञानिक है, दार्शनिक है, उनको तात्त्विक ज्ञान क्यों नहीं है? क्यूंकि जो उनका शूद्र बुद्धि है, अपटु इन्द्रिय है उसके द्वारा ज्ञान लाभ करने के लिए प्रयास कर रहे हैं। इसलिए उसका पास तात्त्विक ज्ञान नहीं है। इसलिए भगवान भगवद-गीता में बताये हैं "एवं परंपरा प्राप्तम इमं राजर्षयो विदुः " परंपरा से बड़े-बड़े राजर्षि लोग ये भगवद-गीता को पालन किया था "स कालेनेह महता योगे नष्टः परन्तप"। वो परंपरा नष्ट होने का कारण वो योग नष्ट हो गया। इसीलिए तुमको मैं बता रहा हूँ, फिर परंपरा सृजन कर रहा हूँ "भक्तो सी प्रियो सी" क्यूंकि तुम हमारा भक्त है। ये परंपरा से ज्ञान लाभ करना चाहिए। हमारा जो वैदिक विधि है आरोह पन्था और अवरोह पन्था। आरोह पन्था का अर्थ होता है एक व्यक्ति जिसको इन्द्रिय अपटु है वो रिसर्च कर रहा है, खोज रहा है की वास्तविक तत्त्व वस्तु क्या चीज़ है। ये इसका नाम है आरोह पन्था। और एक अवरोह पन्था जो ऊपर से तत्त्व वस्तु का ज्ञान मिलता है। उसका नाम अवरोह पन्था है। जो वास्तविक जो वैदिक लोग हैं वो आरोह पन्था को ग्रहण नहीं करते हैं। वो अवरोह पन्था को ग्रहण करते हैं। "एवं परंपरा प्राप्तं इमं राजर्षयो विदुः" ऊपर से ज्ञान देने वाला भगवान से बड़ा और कौन होगा? भगवान खुद कहते हैं:
- यदा यदा हि धर्मस्य, ग्लानिर् भवति भारत,
- अभ्युत्थानम अधर्मस्य, तदात्मानं सृजाम्य अहम्
जब धर्म की ग्लानि होती है, धर्म का अर्थ ये नहीं की कोई आजकल चलता है ऐसा सेंटीमेंट नहीं। धर्म का अर्थ होता है कर्तव्य, ड्यूटी, उसका नाम होता है धर्म। तो जब आदमी सब भूल जाते हैं की वास्तविक क्या कर्तव्य है, तब भगवान आते हैं, भगवान खुद कहते हैं 'तदात्मानं सृजाम्य अहम्'। और "परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्"। दो काम है भगवान का। जो वास्तविक जो साधु है जो तत्त्व वस्तु को समझने के लिए प्रयास कर रहे हैं। साधु कर अर्थ होता है भगवद भक्ति, ज्ञान से भी ऊपर। ये जो भगवान बताते हैं "साधुर एव समंतव्य" कौन? "अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्" अनन्य भाव से जो भगवान का चरण में शरणागत है, वो साधु है"साधुर एव समंतव्य"। तो "परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्" दो चीज़ भगवान का काम होता है जब भगवान आते हैं। इसलिए भगवान विष्णु का हाथ में आपलोग देखेंगे चार हाथ में, दो हाथ में अस्त्र है, गदा है और चक्र है और दो हाथ में पद्मा पुष्प है और शंख है। तो दो हाथ जो है पद्मा पुष्प और शंख ये तो परित्राणाय साधूनां" और जो दो हाथ है "विनाशाय च दुष्कृताम्"। इसलिए जब भगवान आये थे, भगवान रामचंद्र, भगवान कृष्ण दो काम किये। साधु को परित्राण किया और दुष्कृतिं का सब सर्वनाश किया। तो दुष्कृतिं का नाश करने के लिए भगवान यही आते हैं। वो तो उनके इशारे से ही वो काम हो जाता है। वास्तविक आते हैं साधु लोग जो है भगवान का दर्शन के लिए बड़ा आकांक्षित है इसलिए उनको दर्शन देने के लिए आते हैं। और नहीं तो भगवान की इंगी से ये सारी सृष्टि एक सेकंड में ख़तम हो जाती है। तो उसके लिए, जैसा भगवान नरसिंघ देव अवतार में प्रह्लाद को दर्शन दिया। हिरण्यकशिपु क मारने के लिए उनको आने का कोई जरूरत नहीं है। ये सब विचार है। "परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्"। तो तत्त्व वस्तु जो आखरी में वो भगवान। इसलिए इस श्लोक में बता रहे हैं; "वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्"। तत्त्व वस्तु एक ही है। तत्त्व वस्तु दो नहीं हो सकता है। "एको ब्रह्मा द्वितीय नहीं" परन्तु हमारा देखने की जो शक्ति है उसको अलग-अलग होने का कारण, तत्त्व वस्तु अलग-अलग दीखता है। तो तत्त्व वस्तु को जो देखने वाला है कई है जो एक है ब्रह्मवाद 'ब्रह्मेति' और कई एक है जो की परमात्ववाद और कोई एक है जो भगवद भक्तिवाद। तो इसका क्या कारण है; एक ही चीज़ अलग-अलग क्यों दिखाई जाती है। उसका कारण ये ही है की जो अपनी बुद्धि से भगवान को समझना चाहते हैं, वो ब्रह्म ज्योति तक पहुँच सकता है, उससे ज्यादा नहीं। और जो भगवान को अपन ह्रदय में दर्शन करने को चाहते हैं जैसे योगी लोग "ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो" तो उसको परमात्मा दर्शन होता है। ये परमात्मा है कौन? ये भगवान का अंश है। "एकांशेना स्थितो जगत" भगवान बताते हैं। "ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति" जैसे सूर्य देव है उद्धरण के लिए, बारह बजे दिन में ५०० माइल सब आदमी को पूछिए की सूर्य देव कहाँ हैं, सब कोई बोलेगा की हमारा सर पर है। क्या सूर्य देव करोड़ों आदमी का सर का ऊपर अलग-अलग हो गया, नहीं। ये सूर्य का महिमा है, शक्ति है जो सब कोई समझता है। इसी प्रकार भगवान तो एक ही है परन्तु यदि कोई अपने ह्रदय में भगवान को दर्शन करने को चाहते हैं भागवत प्रेम से तो परमात्मा रूप से ही उसका दर्शन होता है। उसका नाम है परमात्मा।
- प्रेमाञ्जन-च्छुरित-भक्ति-विलोचनेन
- संतः सदवै हृदयेषु विलोकयन्ति
जिसको भागवत प्रेम है वो सब समय में भगवान को अपना ह्रदय में दर्शन करता है। और जो ब्रह्मवादी हैं, यानि आखरी तक पहुँचा नहीं, दूर से भगवान को दर्शन करता है वो ब्रह्मवादी निराकारवादी है, ब्रह्मेति। और जो साक्षाद भगवान को दर्शन करने वाला भक्त लोग है, वो भगवदवाद। चीज़ एक ही है, भगवान है। इसलिए भगवान भगवद-गीता में बताये हैं "ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम"। जो निर्विशेष ब्रह्म, निराकार ब्रह्म है उसको आधार मैं हूँ। जैसे सूर्य का प्रकाश, सूर्य का रश्मि, उसका आधार कौन है? सूर्य देव, वो सूर्य प्लेनेट, सूर्य लोक और सूर्य लोक का भीतर वो सूर्य देवता जिसका नाम भगवद-गीता में बताया है विवस्वान, नाम भी बताया है। ये सब है। बाकि योग्यता अनुसार कोई सूर्य का प्रकाश ही देखता है, योग्य का अनुसार कोई सूर्य का लोक है उसको देखता है, और जिसको और आगे बढ़ने की शक्ति है वो विवस्वान, सूर्य देव, सूर्य नारायण, उसको भी देखता है। तो इसी प्रकार जैसे एक पहाड़ है, दूर से आप देखिये, मालूम होता है की कोई बादल है। और आगे बढ़ के देखिये तो मालूम होता है की कोई हरा-हरा चीज़ है। और उधर पर्वत पर पहुँच जाइये तो देखिएगा की उधर बहुत से चीज़ है, जीव भी है, पेड़ भी है, आदमी भी है, पशु भी है। तो इसी प्रकार "वदन्ति तत तत्त्व विदस तत्त्वं" तत्त्व वस्तु एक ही है लेकिन दर्शन का फेर से कोई देखता है ब्रह्म, कोई देखता है परमात्मा, कोई देखता है स्वयं भगवान। ये विचार है। "ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते"। तो उद्देश्य ये ही है जैसे पहले श्लोक में बताया है "जीवस्य तत्त्व जिज्ञासा"। जो आखरी तत्त्व वस्तु जो है भगवान उसको दर्शन करना चाहिए। ज्ञान जो है भगवद-गीता में जैसे बताते हैं;
- बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते
- वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:
वो वास्तविक ज्ञानवान है वो आगे जा करके वो भगवान का चरण में प्रपत्ति करते हैं। क्यो।? वो जानते हैं "वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:"। जो वासुदेव भगवान कृष्णा हैं इनकी और एक मूर्ति है जो परमात्मा और उनका जो अंग ज्योति है ये ब्रह्मज्योति है। ये ब्रह्म संहिता में बताये हैं की;
- यस्य प्रभा प्रभावतो जगद्-अंड-कोटि-
- कोटिषव अशेष-वसुधादि विभूति-भिन्नम्
- तद ब्रह्मा निष्कलम अनंतम अशेष-भूतम्
- गोविंदा आदि-पुरुषम् तम अहम् भजामि
ये जो ब्रह्म है ये भगवान की अंग ज्योति है। जैसा उदहारण है, जैसे सूर्य लोक है, सूर्य लोक का जो ज्योति है, प्रकाश और वो सूर्य लोक में जो निवास करते हैं विवस्वान, सूर्य नारायण, वो समझ लीजिये भगवान। बाकि ये बात नहीं है। ये भगवान का एक सृष्टि है। भगवान तो अनेक दूर में हैं :पंथास तू कोटि-शत-वत्सर-संप्रगम्यो
- वायोर अथापि मनसो-मुनिपुंगवानाम
भगवान को दर्शन, भगवान का जो लोक है "गोलोक एव निवसति अखिलात्म भूतो" ये सब शास्त्र में है। भगवान व्यक्ति है। भगवान व्यक्ति जो है वो स्वयं आकरके हमलोग को दर्शन भी देते हैं "मत्त: परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय" ये हमसे परतत्त्व और कुछ है नहीं।
- अहं सर्वस्य प्रभवो
- मत्त: सर्वं प्रवर्तते
- इति मत्वा भजन्ते मां
- बुधा भावसमन्विता:
केवल समझना है। भगवान तो खुद आते हैं। जो भगवान का भक्त है वो दीखते भी हैं। बाकि हमलोग नहीं चाहते हैं। जैसे आवर प्रोफेसर शेषाद्रि बताया है की असल जो डोंकी है उससे वात्सल्य नहीं होगा। वो जो झूठा डोंकी है उसपे खुद ताली बजाते हैं। ऐसे जैसे असल भगवान हैं उसको कोई नहीं चाहता। एक कोई रास्कल आया बोल दिया की हम भगवान हैं, थोड़ा मैजिक दिखा दिया, वो भगवान है। ये हो बात है। तो असल भगवान को कोई नहीं चाहता है। वो नक़ल करके जो धोका देने वाला है उसको भगवान मानेगा। ये हमारा दुर्भाग्य है। इसीलिए कहते हैं बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते"। ये सब धोका खाते-खाते-खाते अनेक जन्म-जन्मांतर का पश्चात जब उसको बुद्धि खुल जाती है तो ज्ञानवान, असल ज्ञानवान। तो ये असल ज्ञानवान का परिचय क्या है "वासुदेव सर्वं इति" ये ब्रह्म, परमात्मा जो कुछ है ये सब कुछ भगवान वासुदेव है। "ब्रह्मेति परमात्मेति भगवान इति शब्द्यते"। तो वास्तविक वेद में ये हो बताते हैं की "यस्मिन् विज्ञाते सर्वं एवं विज्ञातां भवतिः" यदि आप केवल भगवान को ही समझने के लिए प्रयत्न करें, तो जो और सब चीज़ है वो सब समझ में आ जायेगा अपने-आप। उसके लिए ज्यादा प्रयास करना नहीं है। जैसे हमलोग हैं, हमलोग तो मुर्ख हैं, साइंटिस्ट भी नहीं हैं, कुछ भी नहीं हैं, बाकि जानते हैं क्या चीज़ क्या है। अब जैसा प्रोफेसर शेषाद्रि कहते हैं की वास्तविक लाइट क्या चीज़ है उसको डेफिनिशन। बट वी नो दी डेफिनिशन। ये बात नहीं है डेफिनिशन, कहाँ से हमको मालूम हुआ, भगवान से
- अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्
- जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्
लाइट और जो जड़ वस्तु और जीव क्या फरक है। जीव जड़ वस्तु को चलाता है। जड़ वस्तु जड़ होता है। एक पहाड़ है बहुत भारी है पर क्यूंकि जड़ वस्तु है उसको चाहे एक छोटे से जीव जाके उसको तोड़-फाड देगा। ये जीव है; जो जड़ वस्तु को चलाता है वो जीव है। जैसे ये हमारा शरीर है। ये शरीर को चलाने वाला कौन है? जो मैं जीवात्मा अत्यंत क्षुद्र है, ये शास्त्र में बताया है "१/१०००० पार्ट ऑफ़ दी उप्पर टिप ऑफ़ दी हेयर" "केसाग्र-सत-भागस्य सताधा कल्पितस्य च" ये सब शास्त्र में बताया है की केश का जो अग्र भाग जो है उसको १०० विभाजन कीजिये। और एक सौ भाग है फिर एक भाग ले करके १०० भाग कजिये, वो जो क्षुद्र वस्तु है वो जीवात्मा का है। वो जीवात्मा हाथी का भीतर भी है और उसको भी शरीर चलाता है और चींटी का भीतर भी है और उसको भी शरीर चलाता है। थिस इस दी डिफ्रेंस। वो हाथी बहुत भारी जानवर है उसको शक्ति भी बहुत है, बाकि वो क्षुद्र का "केसाग्र-सत-भागस्य" वो जब निकल जाता है, बस हाथी हो गया काम ख़तम। इसको समझना है "ययेदं धार्यते जगत्" इसी प्रकार सब जगत चल रहा है ये जीवात्मा, जीव भूतो, वो भी भगवन के प्रकृति। ये सब चीज़ भगवद-गीता में बताया है। कोई हमर मुश्किल नहीं है। ये वास्तविक जड़ वस्तु कौन चीज़ है और जीव कौन है। तो ज्यादा रिसर्च करने का जरूरत नहीं है। हमलोग मान लेते हैं भगवान बताया कृष्णचन्द्र ठीक है, बस हमारा काम ख़तम। हमारा परिश्रम करने का क्या ज़रुरत है, रिसर्च। इसका नाम है अवरोह पन्था। वी आर गेटिंग नॉलेज बाई दी डिसेंडिंग प्रोसेस, सो इट इस परफेक्ट। इसका उदहारण स्वरुप जैसा आप बैठे हैं कोई कमरे में और ये हमारा लॉजिक में भी है, इंडक्टिव प्रोसेस और डिडक्टिव प्रोसेस। एक शब्द हुआ खट्ट से, तो जितना आदमी बैठे हैं एक-एक अपना थ्योरी लगाएंगे की ये खट्ट शब्द किधर से आया। और ऊपर से कोई आदमी बोल देते हैं की ये खट्ट शब्द इस तरह से हुआ। बस काम मिल गया। तो इसी प्रकार आप ज्ञान "ज्ञानं परमगुह्यं मे यद् विज्ञानसमन्वितम्" वास्तविक ज्ञान आप भगवान से ग्रहण करें तो आपको ज्ञान पूर्ण होगा। आप पूर्ण नहीं है, मैं पूर्ण नहीं है क्यूंकि भगवान से ज्ञान लाभ किया है न, भगवान जो बोल दिया वो हम मान लिया तो हमारा ज्ञान पूर्ण हो गया। ये बात नहीं है की हम ज्ञानी है, नहीं। क्यूंकि वास्तविक जो ज्ञानी है "वेदाहं समतीतानि" जो की भूत, भविष्य सब कुछ जानता है जैसा भगवान भगवद-गीता में कहते हैं की भगवान जब अर्जुन को बताया;
- इमं विवस्वते योगं
- प्रोक्तवानहमव्ययम्
- विवस्वान्मनवे प्राह
- मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्
तो भगवान कहते हैं की पहले मैं सूर्य देव विवस्वान को बताया। तो बताया था उसका हिसाब करने से, मनु का जीवन का हिस्ट्री लेने से ४००० करोड़ वर्ष पहले उसको बताया था। तो अर्जुन का संदेह हुआ और भगवान से पुछा की यदि देखिये कृष्णा मैं और आप तो हमारा तो समान उम्र है आप कहते हैं की पहले मैं सुन चूका ये कैसे संभव है। तो भगवान क्या बताया? भगवान बताया की देखो जी अर्जुन जब भी हम आते हैं तुम हमारा साथ आते हो, बाकि मैं भूलता नहीं, तुम भूल जाते हो। इतना ही बात। जीव से, भगवान से इतना ही फरक है। भगवान सब जानते हैं, कुछ भूलते नहीं। और जीव अभी दो घंटा पहले क्या काम किया था भूल जाता है। ये बात है। तो इसी प्रकार जो भूल जाने वाले हैं, जो ठगाने वाले हैं, जो नहीं जानते हैं फिर भी ज्ञान का बात करते हैं, इस प्रकार व्यक्ति से हमारा ज्ञान लेने से क्या लाभ होगा। कुछ नहीं। इसीलिए
- तद्-विज्ञानार्थं स गुरुं एवाभिगच्छेत
- समित-पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्म-निष्ठम्
तो वो गुरु का पास जाना चाहिए जो ब्रह्म निष्ठम, जो ब्रह्म वस्तु क्या चीज़ है "ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते", ये तत्त्व ज्ञान जो है जानते हैं। अच्छी तरह से समझते हैं उसको पास जाना चाहिए। "तद्-विज्ञानार्थं स गुरुं एवाभिगच्छेत" बाकि पिताजी जानते हैं उनसे ज्ञान लाभ किया इसलिए उसका जो विज्ञानं है वो परिपूर्ण है। इसी प्रकार जो वास्तविक तत्त्व ज्ञान को जानते हैं उससे आप लीजिये तो आपका ज्ञान परिपूर्ण हो जायेगा। न तो "श्रम ही केवलं"। न ही तो केवल वृथा परिश्रम।
- धर्म: स्वनुष्ठित: पुंसां विष्वक्सेनकथासु य:
- नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम्
सब ज्ञान लाभ किया और यदि असल में भगवान को ही समझा नहीं कर जीव क्या चीज़ है नहीं समझा है और भगवान से जीव से क्या संपर्क है नहीं जानते तो सब "श्रम ही केवलं"। केवल श्रम है, वो ज्ञान नहीं है। इसलिए वास्तविक जो ज्ञान है, जो तपस्या किया, उसके लिए शास्त्र बताते हैं;
- इदं हि पुंसस्तपस: श्रुतस्य वा
- स्विष्टस्य सूक्तस्य च बुद्धिदत्तयो:
- अविच्युतोऽर्थ: कविभिर्निरूपितो
- यदुत्तमश्लोकगुणानुवर्णनम्
आप सायंटिस्ट होइए ठीक है, आप फिलोसोफर होइए, ठीक है, आप इंजीनियर है ठीक है, आप डॉक्टर है ठीक है, ये सब तपस्या से ही ज्ञान होता है। पुंसस्तपस: श्रुतस्य वा, श्रुतस्य माने ज्ञान, जो किताब पढ़ के ज्ञान होता है, इसका नाम है श्रुतस्य। तपस्या का भी होता है। तो जो कुछ बताया गया है ज्ञान लाभ करने के लिए, वो सब चीज़ द्वारा जब आप भगवान को समझा सके, तभी आप का परिपूर्ण होगा। आप केमिस्ट है ठीक है, थ्रू केमिस्ट, जैसे हमारा रविंद्र प्रताप, रामानंद राइ नाम दिया, वो केमिस्ट ह। डॉक्टरेट इन केमिस्ट्री। मैं उनको बताया की तुम्हारा जो विद्या है ये केमिस्ट्री का है। इसके द्वारा दुनिया को समझाओ की ये जो मुर्ख लोग कहते हैं की मैटर से लाइफ होता है, इसको रेफ्यूट करो। ये भी है, और भी है एक केमिस्ट हमारा शिष्य, उसको भी बताया, डॉक्टर स्वरुप दामोदर। तो मैं नहीं बताता, ये शास्त्र का उद्देश्य है। यदि आप केमिस्ट है ठीक है, यदि आप दार्शनिक है ठीक है, आप इंजीनियर है ठीक है, आप डॉक्टर है ठीक है, लेकिन ये सब ज्ञान के द्वारा "का उत्तम श्लोक गुनानुवर्णाने" भगवान की महिमा कीजिये। देखो जी, भगवान कैसा इंजीनियर है उसको दिखाओ, भगवान कितना बड़ा केमिस्ट है उसको दिखाओ, भगवान कितना बड़ा डॉक्टर है उसको दिखाओ, तभी तुम्हारा सफल होगा। अब यदि वो नहीं हुआ "श्रम ही केवलं"। केवल परिश्रम। ये शास्त्र का निर्देश है। "धर्मस्य स्वानुष्ठितः", आगे ये बताया है।
- अत: पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागश:
- स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम्
'संसिद्धिर्हरितोषणम' आप केमिस्ट है,आपका केमिकल नॉलेज से दुनिया को अगर भगवान का विषय समझाइयेगा, तो दुनिया आजकल सब साइंस का भीतर है, केमिस्ट का भीतर है, तो वो लोग मानेंगे, देखो जी इतना भारी केमिस्ट ये तो भगवान का विषय समझा रहा है। तो बहुत भारी सेवा "संसिद्धिर्हरितोषणम्"। भगवान भी संतुष्ट हो जायेंगे की देखो जी ये भी हमारा सेवा के लिए कुछ प्रयत्न बता रहा है। आशीर्वाद, ठीक है। ये हमलोग सीखते हैं। आप जो कुछ होइए, उसमे कोई बाधा नहीं है। केवल जो आपको वास्तविक ज्ञान मिला है, वो ज्ञान का द्वारा भगवान को संतुष्ट कीजिये। "अत: पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागश: हमारा वैदिक नियम के हिसाब से वर्ण और आश्रम है; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ब्रह्मचारी, गृहस्ता, वानप्रस्थ, संन्यास, बस एहि होता है ८ श्रेणी। तो कोई भी श्रेणी में आप रहिये, कोई भी ज्ञान आप लाभ कीजिये, वो ज्ञान वर्णाश्रमविभागश: स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य, अपना जो ड्यूटी है, काम है, उसके द्वारा भगवान को संतुष्ट कीजिये। "स कर्मणा अभ्यर्च्च" थिस इस कृष्णा कोशिएसनेस्स मूवमेंट।
- 1973 - Lectures
- 1973 - Lectures and Conversations
- 1973 - Lectures, Conversations and Letters
- 1973-11 - Lectures, Conversations and Letters
- Lectures - India
- Lectures - India, Delhi
- Lectures, Conversations and Letters - India
- Lectures, Conversations and Letters - India, Delhi
- Lectures - General
- Lectures and Conversations - Hindi
- Lectures and Conversations - Hindi to be Translated
- 1973 - New Audio - Released in May 2015
- 1973 - New Transcriptions - Released in May 2015
- Audio Files 20.01 to 30.00 Minutes